25 साल पुराने सरकारी भवन की बाउंड्री वाल तोड़कर ढलाई, बिना तकनीकी निगरानी काम कराने से संरचनात्मक सुरक्षा पर सवाल

  शिव शर्मा की रिपोर्ट

छुईखदान/खैरागढ़।

खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिले की जनपद पंचायत छुईखदान में प्रशासनिक व्यवस्था और सरकारी निर्माण कार्यों को लेकर गंभीर सवाल सामने आए हैं। एक अराजपत्रित तृतीय श्रेणी कर्मचारी को जनपद पंचायत का प्रभारी मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) बनाए जाने के बाद लिए जा रहे प्रशासनिक एवं वित्तीय निर्णय अब सवालों के घेरे में हैं।

विवाद का केंद्र जनपद पंचायत कार्यालय भवन के मरम्मत/जीर्णोद्धार से जुड़े 10.24 लाख रुपये के दो कार्य हैं। कार्यालय के 22 सितंबर 2026 के निरस्तीकरण आदेश में कहा गया है कि संबंधित कार्यों के लिए कार्यादेश जारी नहीं हुआ था और कोई भुगतान भी नहीं हुआ था। इसके बावजूद करीब 25 वर्ष पुराने जनपद पंचायत कार्यालय भवन में बिना विधिवत तकनीकी मार्गदर्शन के निर्माण कार्य कराया गया और छत की बाउंड्री/पैरापेट तोड़कर ढलाई तक कर दी गई। मामला केवल वित्तीय प्रक्रिया का नहीं, बल्कि सरकारी भवन की सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही का भी बन जाता है।

*कार्यादेश नहीं था तो सरकारी भवन में काम किसने कराया?*

निरस्तीकरण आदेश के अनुसार संबंधित दोनों कार्यों पर अब तक कोई कार्यादेश जारी नहीं किया गया था।

कार्यादेश के बिना जनपद पंचायत कार्यालय भवन में निर्माण कार्य शुरू कैसे हुआ?
किस अधिकारी की अनुमति से काम हुआ?किसने एजेंसी अथवा श्रमिकों को काम करने दिया?किस अधिकारी को इसकी जानकारी थी?
और सबसे महत्वपूर्ण—कार्यालय प्रमुख के रूप में प्रभारी CEO ने कथित अनधिकृत निर्माण को तत्काल क्यों नहीं रुकवाया?

यदि कार्यालय भवन में बिना कार्यादेश निर्माण कराया गया था तो केवल बाद में प्रशासकीय स्वीकृति निरस्त कर देना उस निर्माण की जिम्मेदारी तय करने का विकल्प नहीं हो सकता।

*25 साल पुराने भवन की छत पर अतिरिक्त भार का सवाल*

मामले में सामने आए आरोप के अनुसार छत की बाउंड्री/पैरापेट को तोड़कर उस पर ढलाई का काम कराया गया।

बताया जाता है कि जनपद पंचायत का यह भवन लगभग 25 वर्ष पुराना है। ऐसे भवन की छत पर अतिरिक्त निर्माण कराने से पहले उसकी संरचनात्मक क्षमता का तकनीकी परीक्षण किया जाना महत्वपूर्ण है।

यदि ढलाई बिना स्ट्रक्चरल आकलन, डिजाइन और तकनीकी पर्यवेक्षण के कराई गई है, तो छत पर अतिरिक्त स्थायी भार पड़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। क्या स्लैब की भार-वहन क्षमता जांची गई?
क्या बीम और कॉलम की स्थिति देखी गई?
क्या कोई स्ट्रक्चरल डिजाइन बनाया गया?
क्या लेआउट स्वीकृत हुआ?
क्या सब इंजीनियर मौके पर मौजूद थे? इन सवालों का जवाब तकनीकी जांच से ही मिल सकता है।

*वित्त विभाग के निर्देश में निर्माण शुरू करने से पहले तीन शर्तें*

छत्तीसगढ़ शासन के वित्त विभाग के वित्त निर्देश क्रमांक 26, दिनांक 29 जुलाई 2025 में निर्माण कार्यों की प्रशासकीय एवं पुनरीक्षित प्रशासकीय स्वीकृति के संबंध में कार्य विभाग नियमावली के प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करने को कहा गया है। निर्देश में स्पष्ट रूप से कार्य प्रारंभ करने के संदर्भ में (1) प्रशासकीय स्वीकृति, (2) तकनीकी स्वीकृति और (3) पर्याप्त बजट प्रावधान/उपलब्धता का पालन आवश्यक बताया गया है। साथ ही गुणवत्ता, समय-सीमा और निर्धारित लागत के भीतर कार्य पूरा करने पर जोर दिया गया है।

इस पृष्ठभूमि में छुईखदान का मामला महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि मौके पर वास्तव में कार्यादेश से पहले निर्माण हुआ और वह भी बिना तकनीकी अधिकारी के मार्गदर्शन में, तो यह जांचना होगा कि वित्त विभाग के निर्देश तथा कार्य विभाग नियमावली की प्रक्रिया का पालन किस स्तर पर हुआ।

*कार्य एजेंसी की पात्रता पर भी बड़ा सवाल*

जनपद पंचायत कार्यालय भवन के मरम्मत कार्य के लिए बनाई गई कार्य एजेंसी की पात्रता भी जांच का विषय है।
क्या संबंधित ग्राम पंचायत को इस प्रकार के शासकीय भवन के मरम्मत कार्य के लिए अधिकृत किया जा सकता था?क्या संबंधित ग्राम पंचायत के पास निर्धारित तकनीकी क्षमता थी? किस अधिकारी ने उक्त ग्राम पंचायत को कार्य एजेंसी बनाया? किस नियम और किस प्रावधान के तहत बनाया?

यदि ग्राम पंचायत निर्धारित पात्रता नहीं रखती थी तो उसे जिम्मेदारी सौंपने वाले अधिकारी की जवाबदेही तय क्यों न हो?

यह केवल कागजी प्रक्रिया का सवाल नहीं है। गलत कार्य एजेंसी और बिना तकनीकी नियंत्रण के काम का सीधा असर सरकारी भवन की गुणवत्ता और सुरक्षा पर पड़ सकता है।

*खैरागढ़ जिला पंचायत भवन का मामला भी बनेगा कसौटी*

कार्य एजेंसी की पात्रता को लेकर उठ रहे सवालों के बीच खैरागढ़ के वर्तमान जिला पंचायत कार्यालय भवन से संबंधित एक पुराने मामले का संदर्भ भी सामने आता है। दावा है कि ग्राम पंचायत को कार्य एजेंसी बनाए जाने का मामला छत्तीसगढ़ विधानसभा में उठ चुका है और शासन के जवाब में प्रक्रिया संबंधी गलती स्वीकार की गई थी।

यदि ऐसा आधिकारिक विधानसभा रिकॉर्ड में दर्ज है तो उस प्रश्न और शासन के उत्तर को सार्वजनिक कर यह स्पष्ट करना चाहिए कि खैरागढ़ के मामले में जिस व्यवस्था पर शासन ने आपत्ति/त्रुटि स्वीकार की थी, क्या छुईखदान में भी वैसी ही व्यवस्था अपनाई गई?

*“जनप्रतिनिधियों ने कराया काम”—तो नाम क्यों नहीं?*

इस मामले में प्रभारी CEO द्वारा उच्च कार्यालय को भेजे गए पत्र का कथित उल्लेख भी महत्वपूर्ण है। बताया गया है कि पत्र में जनप्रतिनिधियों द्वारा बिना तकनीकी मार्गदर्शन के कथित मरम्मत कार्य कराए जाने की जानकारी दी गई है।
यदि सरकारी पत्र में यह बात दर्ज है तो “जनप्रतिनिधियों” शब्द के पीछे पूरा मामला छिपाया नहीं जा सकता।

*जनप्रतिनिधि कौन थे?*

उनके नाम क्या हैं? उन्होंने किस तारीख को काम कराया?किस हिस्से में काम कराया?किसके निर्देश पर कराया? क्या प्रभारी CEO अथवा कार्यालय के अन्य अधिकारियों को इसकी जानकारी थी?

यदि प्रभारी CEO ने स्वयं उच्च कार्यालय को यह सूचना दी है तो संबंधित जनप्रतिनिधियों के नाम सहित लिखित सूचना/शिकायत जिला पंचायत CEO, कलेक्टर और संबंधित तकनीकी विभाग को भेजना तथा स्थल जांच कराना आवश्यक है l सरकारी भवन में बिना तकनीकी अनुमति काम कराने वालों की जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए।

*वित्तीय प्रभार मिला, लेकिन अधिकारों की सीमा क्या?*

प्रभारी CEO , जोकि एक अराजपत्रित तृतीय श्रेणी कर्मचारी है को वित्तीय प्रभार जिला पंचायत CEO प्रेम कुमार पटेल द्वारा कलेक्टर खैरागढ़ के अनुमोदन से दिए जाने की जानकारी है।
इसलिए यहां सवाल केवल “वित्तीय प्रभार था या नहीं” का नहीं है। सवाल यह है कि—वित्तीय प्रभार के आदेश में वास्तव में कौन-कौन से अधिकार दिए गए थे?
क्या उसमें कार्यालय प्रमुख के सभी अधिकार शामिल थे?
क्या निर्माण कार्यों से संबंधित निर्णय लेने की शक्ति दी गई थी? क्या एक ग्राम पंचायत को कार्य एजेंसी तय करने का अधिकार था? क्या प्रशासकीय स्वीकृति निरस्त करने का अधिकार था?
क्या तकनीकी स्वीकृति को निष्प्रभावी घोषित करने की शक्ति थी? इन प्रश्नों का उत्तर मूल वित्तीय प्रभार आदेश से ही निकलेगा।

इस मामले में यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या अराजपत्रित तृतीय श्रेणी कर्मचारी को किसी कार्यालय का प्रमुख बनाने का अलग से कोई शासनादेश जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी प्रेम कुमार पटेल को मिला था?

उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों और शासकीय रिकॉर्ड में ऐसा सीधा आदेश नहीं है, जिसमें जनपद पंचायत CEO जैसे पद के संदर्भ में यह घोषित किया गया हो कि अराजपत्रित तृतीय श्रेणी कर्मचारी को किसी भी परिस्थिति में कार्यालय प्रमुख का प्रभार दिया जा सकता।

एक महत्वपूर्ण सामान्य सिद्धांत जरूर सामने आता है: पद, प्रभार और “Head of Office” के अधिकार अलग-अलग चीजें हैं और अधिकार नियम/आदेश से निर्धारित होते हैं। छुईखदान जनपद पंचायत के मामले में निर्णायक दस्तावेज होगा—प्रभारी CEO का मूल आदेश और उसमें स्पष्ट रूप से प्रत्यायोजित शक्तियों का विवरण।

*आधे से अधिक जनपद सदस्य बोले—प्रभारी CEO को हटाओ*

मामले को और गंभीर बनाता है जनपद पंचायत के आधे से अधिक सदस्यों द्वारा प्रशासन को दिया गया लिखित आवेदन, जिसमें एक अराजपत्रित तृतीय श्रेणी कर्मचारी को प्रभारी CEO के पद से तत्काल हटाने की मांग की गई है। यदि निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की इतनी बड़ी संख्या अधिकारी को हटाने की मांग कर रही है, तो शिकायतों की स्वतंत्र जांच और अधिकारी को दिए गए अधिकारों की समीक्षा किए जाने की मांग को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

*15वें वित्त की राशि “Restore” होगी तो किस नियम से?

निरस्तीकरण आदेश में 10.24 लाख रुपये की राशि को 15वें वित्त आयोग के मूल कोष में “Restore” करने और भविष्य में अन्य जनहितकारी कार्यों में उपयोग करने की बात कही गई है।लेकिन यहां भी सवाल है कि राशि किस वित्तीय वर्ष की है, किस मद की है, Tied है या Untied, और उसकी वर्तमान लेखा/PFMS स्थिति क्या है।

केवल प्रशासनिक आदेश में “Restore” लिख देना अपने आप में यह प्रमाणित नहीं करता कि राशि को भविष्य में किसी भी अन्य कार्य में खर्च किया जा सकता है। उसके लिए संबंधित वित्तीय वर्ष, योजना के दिशा-निर्देश, लेखा अभिलेख और शासन के लागू निर्देशों का परीक्षण जरूरी है।

*अब जांच फाइल की ही नहीं, भवन की भी होनी चाहिए*

इस मामले में स्वतंत्र जांच के साथ तकनीकी स्ट्रक्चरल ऑडिट की जरूरत है।
जांच दल को यह देखना चाहिए—

* छत की बाउंड्री/पैरापेट कहां और कितनी तोड़ी गई;
* कितनी ढलाई कराई गई;
* ढलाई की मोटाई और सामग्री क्या थी;
* अतिरिक्त भार कितना पड़ा;
* स्लैब, बीम और कॉलम की वर्तमान स्थिति क्या है;
* कोई डिजाइन/लेआउट उपलब्ध है या नहीं;
* सब इंजीनियर ने कोई तकनीकी निर्देश दिया था या नहीं;
* कार्यादेश जारी हुआ था या नहीं;
* माप पुस्तिका में काम दर्ज है या नहीं;
* कार्य एजेंसी की पात्रता क्या थी;
* और निर्माण से भवन की संरचनात्मक सुरक्षा पर कोई प्रभाव पड़ा है या नहीं।

असली सवाल: काम हुआ तो किसकी अनुमति से? एक तरफ सरकारी आदेश कहता है कि कार्यादेश जारी नहीं हुआ और भुगतान शून्य है। दूसरी तरफ सरकारी कार्यालय की छत की बाउंड्री तोड़कर ढलाई तक कर दी गई l तो सवाल अब 10.24 लाख की स्वीकृति से बड़ा है—

कार्यादेश के बिना काम हुआ तो किसके आदेश पर?
बिना तकनीकी मार्गदर्शन हुआ तो जिम्मेदार कौन?
अपात्र एजेंसी बनाई गई तो किसने बनाई?
जनप्रतिनिधियों ने काम कराया तो उनके नाम सरकारी रिकॉर्ड में क्यों नहीं?
और यदि काम अनधिकृत था तो उसे रोकने की जिम्मेदारी किस अधिकारी की थी?

*जवाबदेही तय करने का वक्त*

जनपद पंचायत का सरकारी भवन किसी प्रयोगशाला की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। करीब 25 वर्ष पुराने भवन की छत पर तकनीकी परीक्षण और सक्षम निगरानी के बिना अतिरिक्त निर्माण हुआ है या नहीं—यह तत्काल तकनीकी जांच का विषय है।

इस पूरे प्रकरण में जिला प्रशासन को केवल निरस्तीकरण आदेश तक सीमित रहने के बजाय प्रशासनिक, वित्तीय और तकनीकी—तीनों स्तर पर स्वतंत्र जांच करानी चाहिए। कार्यादेश, कार्य एजेंसी, तकनीकी स्वीकृति, लेआउट, माप पुस्तिका, साइट निरीक्षण, वित्तीय प्रभार आदेश और प्रभारी CEO के पत्र को जांच के केंद्र में रखा जाना चाहिए।
क्योंकि अगर सरकारी रिकॉर्ड में कार्यादेश “शून्य” है, भुगतान “शून्य” है, लेकिन सरकारी भवन पर निर्माण “वास्तविक” है—तो फिर इस काम की जिम्मेदारी “शून्य” नहीं हो सकती।

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