बांदा की शिल्पा ने बदली आधी आबादी की किस्मत, अपने हुनर व लगन से लिखी समृद्धि की नई दास्तां*

Blog

अनिल सक्सेना की रिपोर्ट

बांदा |-* बुंदेलखंड की धरती अब केवल अपनी वीरता के लिए ही नहीं बल्कि ग्रामीण महिलाओं के उद्यमी बनने के हौसले के लिए भी पहचानी जा रही है। इसकी सबसे ताजा और बड़ी मिसाल पेश की है बबेरू क्षेत्र के कुमहेडा गांव की रहने वाली शिल्पा कुशवाहा ने, कभी घर की चारदिवारी और चूल्हे चौके तक सीमित रहने वाली शिल्पा कुशवाहा ने आज अपने गांव की अन्य महिलाओं के साथ मिलकर बुंदेली स्वाद को एक नई पहचान दी है। शिल्पा के साथ जुड़ी समूह की अन्य महिलाओं के द्वारा बुंदेलखंड के कठिया गेहूं से बनी दलिया समेत कई तरह के आचार, सत्तू व मसाले को बनाने का काम किया जाता है और मार्केटिंग तक की जिम्मेदारी इन लोगों के कंधों पर है। जिसके चलते यह महिलाएं अच्छी कमाई कर लेती है और अपने पैरों पर खड़ी हैं।

*गावों की दर्जनों महिलाओं की रसोई में भरी खुशहाली*

उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत मिले प्रशिक्षण ने शिल्पा को एक साधारण ग्रहणी से एक कुशल बिजनेस वूमेन में बदल दिया। जिसके बाद शिल्पा ने बुंदेली विरासत को ब्रांड बना दिया। उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन की उंगली पकड़कर शिल्पा ने न केवल खुद को आत्मनिर्भर बनाया है। बल्कि गांव की दर्जनों महिलाओं की रसोई में खुशहाली की महक भर दी है। शिल्पा कुशवाहा “प्रगति महिला स्वयं सहायता समूह” का संचालन करती हैं। जिसमें 11 महिलाएं हैं जिनके द्वारा कठिया गेहूं के उत्पाद बनाए जाते हैं। वहीं मसाले, बुकनू, अचार व सत्तू जैसी चीजों को बनाया जाता है। शिल्पा ने इन चीजों को “देहाती” ब्रांड नाम दिया है।

शिल्पा कुशवाहा ने बताया कि सन 2014 में मैंने बुंदेलखंड के कठिया गेहूं से दलिया बनाने का काम शुरू किया था। लेकिन उस समय सबसे बड़ी समस्या इसको बेचने की थी। लेकिन फिर भी मैंने हिम्मत नहीं हारी और गांव व कस्बों में जाकर इसको बेचने का काम किया। वहीं साल 2020 में मैंने समूह का गठन किया और समूह को सरकार से पहली बार 20 हजार रुपए का लोन मिला। उसके बाद 30 हजार, फिर 50 हजार और फिर 2 लाख रुपए का लोन मिला। जिससे इस व्यवसाय को हमने बढ़ाया और आज समूह में 11 महिलाएं हैं। वही गांव की लगभग दो दर्जन अन्य महिलाएं भी हमसे जुड़ी है जो हमारे इस काम में हमारा सहयोग करती हैं। इन्होंने बताया कि प्रतिमाह लगभग 20 हजार का मुझे मुनाफा हो जाता है। तो वही गांव की अन्य महिलाएं जो हमारे इस काम में जुड़ी हैं उन्हें भी लगभग तीन से चार हजार रुपये प्रति माह मिल जाते हैं।

शिल्पा की यह सफलता केवल पैसों तक सीमित नहीं है। बल्कि उन हजारों ग्रामीण महिलाओं के लिए एक मशाल की तरह है जो अपने घर की चारदीवारी में अपने हुनर को दबाए बैठी हैं। शिल्पा की यह कहानी साबित करती है कि यदि ग्रामीण महिलाओं को सही प्रशिक्षण और सही ढंग से सरकारी योजनाओं का सहारा मिले तो वह अपनी किस्मत खुद बदल सकती हैं। आज कुमहेडा का यह समूह न केवल शुद्धता का प्रतीक है बल्कि आत्मनिर्भर भारत की जीती जागती तस्वीर भी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *