सुशील कुमार मिश्रा की रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद में विकास और सुंदरीकरण के नाम पर एक बार फिर आस्था और प्रशासन आमने–सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं। मामला कालू कुआं चौराहा, बबेरु रोड स्थित लगभग 60 वर्ष पुराने पीपल के वृक्ष और उसके नीचे स्थापित मंदिर से जुड़ा है, जिसे हटाने को लेकर प्रशासनिक तंत्र के भीतर ही गंभीर असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
इस प्रकरण में हैरान करने वाली बात यह है कि एक ही विषय पर प्रशासन के अलग–अलग विभागों की परस्पर विरोधी राय सामने आ रही है। मंदिर की देखरेख करने वाली महंत गीता देवी ने बताया कि वन विभाग द्वारा पीपल के वृक्ष को पूरी तरह सुरक्षित घोषित किया गया है। इसी भरोसे के आधार पर वे तीर्थयात्रा पर रवाना हो रही हैं।
महंत गीता देवी का स्पष्ट कहना है कि पीपल का वृक्ष सड़क से पर्याप्त दूरी पर स्थित है और न तो यातायात में बाधा है, न ही किसी विकास कार्य में। उन्होंने कहा कि यह वृक्ष और मंदिर दशकों से क्षेत्रवासियों की आस्था का केंद्र रहा है।
इस संबंध में जब वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी (DFO) से बातचीत की गई, तो उन्होंने भी साफ शब्दों में कहा कि पीपल का वृक्ष सुरक्षित है और उसे हटाने की कोई आवश्यकता नहीं है। वन विभाग की यह राय आस्था से जुड़े लोगों के लिए बड़ी राहत मानी जा रही है।
लेकिन दूसरी ओर राजस्व विभाग और लोक निर्माण विभाग (PWD) विकास और सुंदरीकरण का हवाला देते हुए पीपल के वृक्ष और मंदिर को हटाने का दबाव बना रहे हैं। इससे न केवल प्रशासनिक भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई है, बल्कि आम जनता के मन में भी असंतोष बढ़ता जा रहा है।
इस पूरे मामले में अब विश्व हिंदू परिषद (VHP) भी खुलकर सामने आ गई है। संगठन के प्रांत कार्यकारिणी सदस्य चंद्र मोहन बेदी ने कहा कि यह मंदिर और पीपल का वृक्ष पिछले 60 वर्षों से क्षेत्रवासियों की आस्था का केंद्र है, जहां प्रतिदिन पूजा-अर्चना होती है। उन्होंने प्रशासन से मांग की कि अधिकारी आपस में विरोधाभासी बयान देकर जनता को भ्रमित न करें।
विश्व हिंदू परिषद ने स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि प्रशासन ने स्थानीय जनता, साधु–संतों और धार्मिक संगठनों से संवाद किए बिना कोई एकतरफा कार्रवाई की, तो संगठन जनता के साथ मिलकर वृक्ष और मंदिर की रक्षा के लिए आंदोलन करने को बाध्य होगा।
फिलहाल यह मामला बांदा में “विकास बनाम विश्वास” की एक बड़ी बहस बन चुका है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विकास के नाम पर वर्षों पुरानी आस्था को कुचला जाएगा, या फिर संवाद और समन्वय से ऐसा समाधान निकलेगा, जिसमें विकास भी हो और आस्था भी सुरक्षित रहे।
