संजय दुबे
अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जान एफ केनेडी ने 15मार्च1962 को एक भाषण में उपभोक्ता संरक्षण के मामले में अपने विचार व्यक्त करते हुए सजगता की उम्मीद की थी। धीरे धीरे उपभोक्ता संरक्षण आंदोलन समूचे विश्व में प्रसारित होते गया। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। भारत के तत्कालीन उप राष्ट्रपति हिदायतुल्लाह ने रीडर्स डाइजेस्ट पत्रिका में उपभोक्ता संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। 1986में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम अस्तित्व में आया तब से जिला,राज्य और केंद्र स्तर पर फोरम बने और उपभोक्ताओं के द्वारा वस्तु और सेवा में गुणवत्ता के स्तर पर कमी होने पर न्याय कर रहे हैं
कितना न्याय हो रहा है ये विमर्श की बात है लेकिन आवश्यकता इस बात की है कि सरकार को उपभोक्ता के पीछे खड़े होने के बजाय सामने खड़े होने का साहस करना चाहिए।
अक्सर एक विज्ञापन हमे रेडियो में सुनने और दूरदर्शन के चैनलो में देखने सुनने को मिलता है कि उपभोक्ता विक्रेता से एमआरपी में भाव ताव करे। शहरी क्षेत्र की बात ले तो अर्ध शिक्षित उपभोक्ताओं की भरमार है तो गांव के उपभोक्ता से उम्मीद करना बेकार है। सजगता केवल रेडियो और दूरदर्शन से आ जाती तो क्या बात होती। सरकार को किसी उत्पाद के निर्माण व्यय की जानकारी पता लगाना कठिन काम नहीं है। इसमें आज के दौर में उत्पादक एमआरपी(MRP)प्रदर्शित कर रहा है अर्थात अधिकतम विक्रय मूल्य(maximum retail price) अधिकतम मूल्य में अधिकतम लाभ, निर्माण व्यय के साथ जुड़ा होता है। सरकार सिर्फ इतना कर दे कि उत्पाद में उत्पादन मूल्य और लाभ को अलग अलग प्रदर्शित कर दे या फिर अधिकतम लाभ की जगह सामान्य लाभ को जोड़वा दे तो उपभोक्ता को बिना सजगता के संरक्षण मिल जायेगा। भारत में2004तक मूल्य प्रदर्शन और नियंत्रण आदेश लागू था जिसके अंतर्गत थोक विक्रेता 2और चिल्लहर विक्रेता 4प्रतिशत लाभ ले सकता था। बाजारवाद ने इस आदेश को समाप्त करवा दिया और बाजार में वस्तु अथवा सेवा का मूल्य मुनाफे के चरम तक पहुंच गई है। दवाइयों में 100से300प्रतिशत का अधिकतम लाभ जुड़ कर बीमार व्यक्तियों को मिलना उपभोक्ता संरक्षण न हो कर उपभोक्ता शोषण है। सरकार बिल की अनिवार्यता की बात करती है लेकिन इस बिल में अगर गड़बड़ी है तो उपभोक्ता को फोरम में जाने की मजबूरी है। यदि केंद्र सरकार सभी राज्यों के खाद्य उपभोक्ता संरक्षण विभाग के अधिकारियो को उपभोक्ता की तरफ से फोरम में वाद दायर करने का अधिकार दे दे तो देश में लाखो उपभोक्ता संरक्षित हो सकते है।