सोनू करबरिया की रिपोर्ट
बांदा जनपद के नरैनी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। जहां एक ओर सरकार गरीबों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने का दावा करती है, वहीं जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट दिखाई दे रही है।
शाम लगभग 5 बजे कालिंजर रोड स्थित नरैनी पेट्रोल पंप के पास एक गंभीर सड़क दुर्घटना हो गई, जिसमें राधेश्याम नामक व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो गए। दुर्घटना के बाद स्थानीय लोगों ने तुरंत 108 एम्बुलेंस की मदद से उन्हें नरैनी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया।
लेकिन अस्पताल पहुंचने के बाद जो स्थिति सामने आई, उसने मानवता को शर्मसार कर दिया। घायल राधेश्याम के पैर से लगातार खून बह रहा था, लेकिन अस्पताल में इमरजेंसी ड्यूटी पर कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था। मजबूर होकर घायल को काफी देर तक इलाज के लिए इंतजार करना पड़ा।
इस दौरान सामाजिक कार्यकर्ता उमेश तिवारी ने कई बार नरैनी के अधीक्षक को फोन किया, लेकिन उनका फोन नहीं उठा। इसके बाद मुख्य चिकित्साधिकारी (CMO) को भी फोन किया गया, किंतु वहां से भी कोई जवाब नहीं मिला।
स्थिति इतनी दयनीय थी कि डॉक्टर की अनुपस्थिति में वार्ड बॉय ही मरीज की प्राथमिक देखभाल करने को मजबूर थे। सवाल यह उठता है कि जब सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर ही समय पर उपलब्ध नहीं होंगे, तो गरीब और जरूरतमंद मरीज आखिर किसके भरोसे इलाज कराएंगे?
काफी देर इंतजार और फोन कॉल के बाद अंततः डॉक्टर देवेंद्र अस्पताल पहुंचे, तब जाकर घायल का इलाज शुरू हो पाया।
यह घटना एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या सरकारी अस्पतालों में गरीबों का जीवन इतना सस्ता हो गया है कि उन्हें इलाज के लिए घंटों खून बहाते हुए इंतजार करना पड़े?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि अस्पताल में प्रभावशाली और रसूखदार लोगों के लिए ही डॉक्टर तुरंत उपलब्ध हो जाते हैं, जबकि गरीब और साधारण मरीजों को अक्सर इसी तरह की लापरवाही का सामना करना पड़ता है।
अब सवाल यह है कि क्या जिला स्वास्थ्य विभाग इस गंभीर लापरवाही पर कोई कार्रवाई करेगा, या फिर गरीबों की जिंदगी यूं ही सिस्टम की बेरुखी का शिकार होती रहेगी?
