ख़बर का असर: जाँच के नाम पर खानापूर्ति, मामला हुआ रफा दफा

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सुशील मिश्रा की रिपोर्ट

बांदा- पीसीपीएनडीटी एक्ट के पालन को लेकर शहर में चल रहे गोरखधंधे पर लगातार उठ रही आवाज़ों के बीच आज हुई औपचारिक जाँच सिर्फ खानापूर्ति बनकर रह गई।

स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि अधिकारियों की टीम के आने की सूचना पहले ही संबंधित केंद्रों तक पहुँचा दी गई थी, इसलिए आज डॉक्टरों को फ़ोन कर बुलाया गया, जबकि सामान्य दिनों में वे ज्यादातर नदारद रहते हैं। सूत्रों के अनुसार बालाजी डायग्नोस्टिक में भी पूर्व सूचना के चलते डॉक्टर को बुलाया गया, वरना वहां भी उनकी मौजूदगी संदिग्ध रहती है।

 

बजरंगा डायग्नोस्टिक पर गंभीर सवाल

जाँच के दौरान यह सामने आया कि बजरंगा डायग्नोस्टिक में मेडिकल कॉलेज में तैनात डॉ. पी.एस. सागर की डिग्री लगी मिली, जबकि उनकी ड्यूटी दो बजे तक मेडिकल कॉलेज में रहती है।

यह सवाल और बड़ा हो गया कि जब डॉक्टर दो बजे तक मेडिकल कॉलेज में रहते हैं, तो दूसरी जगह अल्ट्रासाउंड की रिपोर्टिंग कौन करता है?
इस पर न तो विभागीय अधिकारी और न ही जाँच अधिकारी कोई जवाब दे सके।

आज वे अचानक दो बजे से पहले ही बजरंगा डायग्नोस्टिक सेंटर पहुँच गए—लेकिन यह बताने में असमर्थ रहे कि सरकारी ड्यूटी के दौरान वे वहाँ क्यों पहुँचे।

और अब सबसे महत्वपूर्ण बात—मेडिकल कॉलेज में बायोमैट्रिक्स अटेंडेंस लगती है, जिससे यह साफ-साफ पता चल जाएगा कि डॉ. पी.एस. सागर कितने घंटे कहाँ ड्यूटी करते हैं और किस समय कहाँ मौजूद थे।
इस रिकॉर्ड से पूरा सच सामने आ सकता है।

स्थानीय लोगों का आरोप यह भी है कि यहां लंबे समय से दीपक मिश्रा नामक टेक्नीशियन ही रोज अल्ट्रासाउंड करता है, और पूरा खेल शासन–प्रशासन की मिलीभगत से चल रहा है।

सूचना लीक होना सबसे बड़ा सवाल

सिटी मजिस्ट्रेट और एसीएमओ के पहुँचने से पहले जाँच की सूचना डायग्नोस्टिक केंद्रों तक कैसे पहुँच गई—यह पूरी कार्रवाई की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करती है।

 

लिंगानुपात संकट में, फिर भी खानापूर्ति एक्स्प्रेस दौड़ी

लिंगानुपात के मामले में बांदा पहले से ही ‘रेड ज़ोन’ में है, इसके बावजूद जाँच के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की गई।
जहां कड़ी कार्रवाई की जरूरत थी, वहां दिखावे की औपचारिकता ने संवेदनशील मामले को और गंभीर बना दिया।

 

अध्यक्ष स्वयं जिलाधिकारी, फिर भी खेल जारी

गौरतलब है कि पीसीपीएनडीटी एक्ट निगरानी समिति की अध्यक्ष खुद जिलाधिकारी होती हैं, बावजूद इसके विभागीय मिलीभगत व ‘मंथली चढ़ावे’ के गंभीर आरोपों के बीच यह खेल बेखौफ चलता रहा है।

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