संकलनमंदसौर/नाहरगढ(तुलसीराम राठौर)–
एक पिता का जीवन भी दीपावली के दीपक जैसा होता है
खुद अंधेरे में रहकर पूरे परिवार के जीवन को रोशन करता है
अपनी खुशियों को पीछे छोड़कर परिवार की खुशियों के दीप जलाता है
दीपावली आते ही हर घर में खुशियों की तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। कहीं नए कपड़ों की खरीदारी होती है, कहीं मिठाइयाँ आती हैं, तो कहीं घर को सजाने के लिए दीपक, झालर और रंगोली खरीदी जाती है। बच्चों के चेहरों पर नए कपड़ों और पटाखों की खुशी होती है। परिवार के हर सदस्य की अपनी-अपनी इच्छाएँ होती हैं।
लेकिन इन सब इच्छाओं के बीच एक पिता भी होता है
जो अपनी इच्छाओं को चुपचाप मन के किसी कोने में छिपाकर परिवार की इच्छाओं को पूरा करने में जुट जाता है।
त्योहार के दिनों में भले ही उसके अपने तन पर नया वस्त्र न हो, लेकिन बच्चों और परिवार के सदस्यों को नए कपड़ों में देखकर वह उन्हीं की खुशियों में अपनी खुशी ढूँढ़ लेता है।
खुद के पैरों में नई जूती हो या न हो, लेकिन बच्चों के लिए नए जूते खरीदने में वह कभी देर नहीं करता।
पत्नी से करवाचौथ और दीपावली पर नई साड़ी व उपहार देने का किया हुआ वादा भी वह नहीं भूलता।
और फिर… मन ही मन सोचता है कि इस बार बस अपने लिए एक नया मोबाइल खरीद लूँ… इतने में ही बहुत है।
इन्हीं छोटी-सी इच्छा को लेकर एक पिता मोबाइल की दुकान पर पहुँचता है। वह मोबाइल देखने लगता है, तभी पीछे से उसका बेटा धीरे से कहता है—
“पापा, आप मुझसे किया हुआ वादा भूल गए क्या? आपने कहा था दीपावली पर मुझे नया मोबाइल दिलाएँगे।”
एक पल के लिए पिता अपने मन की इच्छा को देखता है… और अगले ही पल बेटे की आँखों में चमकती खुशी को।
वह मुस्कुराते हुए दुकानदार से कहता है—
“मेरे बेटे को एक अच्छा-सा मोबाइल दे दीजिए, जो बजट में हो।”
फिर थोड़ी देर रुककर कहता है—
“और हाँ, एक काम और कर दीजिए… मेरे इस पुराने मोबाइल की डिस्प्ले टूट गई है, बस इसमें नई डिस्प्ले लगा दीजिए।”
दुकानदार के सामने यह एक साधारण-सी बात होती है, लेकिन उस पिता के मन में एक अधूरी इच्छा फिर से चुपचाप दब जाती है।
कई बार एक पिता की जेब के हिसाब और परिवार की इच्छाओं के बीच एक अनकहा संघर्ष चलता रहता है। महीने भर की कमाई, घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई, भविष्य की जिम्मेदारियाँ… इन सबके बीच वह हर त्योहार को परिवार के लिए खुशियों से भरने की कोशिश करता है।
वह अपनी इच्छाओं को मारकर नहीं, बल्कि परिवार की खुशियों में अपनी इच्छाओं को भूलकर जीता है।
अपनी सारी इच्छाओं को का गला घोटकर जीता है एक पिता क्योंकि वह एक पिता है
उसके चेहरे की मुस्कान के पीछे कितनी चिंताएँ छिपी होती हैं, उसकी जेब में कितने अधूरे सपने होते हैं और उसके मन में कितनी इच्छाएँ अधूरी रह जाती हैं… यह शायद ही कोई जान पाता है।
क्योंकि वह एक पिता है…
जिसके लिए परिवार की खुशी ही सबसे बड़ा त्योहार है।
पिता के त्याग, प्रेम और समर्पण को नमन।
आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ।
पूर्व सैनिक मुकेश गुर्जर (पालड़ी)