*युवा पीढ़ी की साहित्यिक-सांस्कृतिक अरुचि भारतीय चेतना का संकट

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  पंचनद न्यूज से विजय द्विवेदी

 

*भारतीय युवा पीढ़ी आज एक सांस्कृतिक संक्रमण के दौर से गुजर रही है। यदि समय रहते उन्हें भारतीय साहित्य, इतिहास और संस्कृति से नहीं जोड़ा गया तो आने वाले समय में सामाजिक संबंध, नैतिक मूल्य और सांस्कृतिक पहचान गंभीर संकट में पड़ सकती है। इसलिए परिवार, समाज, शिक्षा व्यवस्था और शासन—सभी को मिलकर युवा पीढ़ी को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ने का प्रयास करना होगा। तभी हम उन्हें दिशाहीन भौतिक दौड़ और आभासी आकर्षण से निकालकर एक संस्कारित, जागरूक और राष्ट्रनिष्ठ नागरिक बना सकेंगे।*

 

वर्तमान समय विज्ञान और तकनीक का युग है। इंटरनेट और स्मार्टफोन ने मानव जीवन को अत्यंत सरल बना दिया है। ज्ञान, सूचना और संवाद के असंख्य साधन आज एक छोटे से मोबाइल फोन में उपलब्ध हैं। किंतु जिस तकनीक का उपयोग ज्ञानवर्धन, व्यक्तित्व विकास और समाज निर्माण के लिए होना चाहिए था, वही आज युवा पीढ़ी को दिशाहीन मनोरंजन, फूहड़ता, अश्लीलता और कृत्रिम आभासी दुनिया की ओर धकेल रही है। विशेष रूप से सोशल मीडिया पर बढ़ती बेतुकी रील्स, अश्लील कॉमेडी, निरर्थक वीडियो और लाइक-फॉलोअर्स की अंधी दौड़ ने युवाओं को भारतीय साहित्य, संस्कृति, इतिहास और नैतिक मूल्यों से दूर कर दिया है। यह स्थिति केवल एक सामाजिक परिवर्तन नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

 

भारत विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक है। यहाँ का साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहा, बल्कि जीवन-दर्शन, नीति, धर्म, समाज, राजनीति और मानवीय मूल्यों का मार्गदर्शक रहा है। भारतीय साहित्य ने सदैव समाज को दिशा देने का कार्य किया। महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित ‘रामायण’ केवल एक महाकाव्य नहीं, बल्कि आदर्श जीवन का संविधान है। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित ‘महाभारत’ मानव जीवन की जटिलताओं, धर्म-संकटों और राजनीतिक परिस्थितियों का विराट दस्तावेज है। इन ग्रंथों ने हजारों वर्षों तक भारतीय समाज को संस्कारित किया।

 

महाकवि कालिदास ने अपनी रचनाओं ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’, ‘मेघदूतम्’ और ‘रघुवंशम्’ के माध्यम से प्रकृति, प्रेम, संवेदना और संस्कृति का अद्भुत चित्रण किया। बाणभट्ट की ‘कादम्बरी’ को विश्व के प्रारंभिक गद्य-उपन्यासों में गिना जाता है। विष्णु शर्मा द्वारा रचित ‘पंचतंत्र’ ने नीति, व्यवहार और बुद्धिमत्ता का ऐसा ज्ञान दिया जिसका अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हुआ। कौटिल्य का ‘अर्थशास्त्र’ आज भी राजनीति और प्रशासन का महान ग्रंथ माना जाता है। कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ भारतीय इतिहास लेखन की उत्कृष्ट कृति है।

 

स्पष्ट है कि भारतीय साहित्य केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा का प्रतिबिंब है। दुर्भाग्यवश आज की युवा पीढ़ी इन अमूल्य धरोहरों से निरंतर दूर होती जा रही है। आज अधिकांश युवाओं का समय मोबाइल स्क्रीन पर बीत रहा है। घंटों तक रील्स देखना, निरर्थक वीडियो पर हँसना, लाइक और शेयर के पीछे भागना तथा सोशल मीडिया पर आभासी लोकप्रियता प्राप्त करना ही जीवन का लक्ष्य बनता जा रहा है। यह स्थिति मानसिक और सांस्कृतिक दोनों स्तरों पर अत्यंत घातक है।

 

कुछ दशक पहले तक भारतीय गांवों और परिवारों में सामाजिक आत्मीयता दिखाई देती थी। पूरा गांव एक परिवार की तरह जीवन जीता था। लोग परस्पर सुख-दुख साझा करते थे। बुजुर्ग बच्चों को लोककथाएँ, इतिहास और धार्मिक प्रसंग सुनाते थे। परिवारों में रामायण, महाभारत, कथा-कीर्तन और साहित्यिक चर्चा होती थी। इससे बच्चों में नैतिकता, संस्कार और समाज के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित होती थी। किंतु आधुनिक तकनीकी जीवन शैली ने इस आत्मीयता को धीरे-धीरे समाप्त कर दिया।

 

आज स्थिति यह है कि एक ही घर में चार सदस्य उपस्थित रहते हैं, लेकिन सभी अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त रहते हैं। संवाद समाप्त हो रहा है, संवेदनाएँ कमजोर हो रही हैं और पारिवारिक संबंध औपचारिक बनते जा रहे हैं। सोशल मीडिया ने वास्तविक जीवन की जगह आभासी दुनिया को अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। युवा यह भूलते जा रहे हैं कि लाइक और फॉलोअर्स जीवन की वास्तविक उपलब्धि नहीं होते। वास्तविक उत्कर्ष ज्ञान, चरित्र, संस्कार और समाजोपयोगी कार्यों से प्राप्त होता है।

 

युवाओं में साहित्य और इतिहास के प्रति घटती रुचि का एक प्रमुख कारण शिक्षा व्यवस्था भी है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली अत्यधिक व्यावसायिक और परीक्षा-केंद्रित हो चुकी है। विद्यार्थियों को केवल अंक प्राप्त करने और नौकरी पाने की दिशा में तैयार किया जा रहा है। भारतीय संस्कृति, प्राचीन साहित्य, ऐतिहासिक चेतना और नैतिक शिक्षा को अपेक्षित महत्व नहीं दिया जा रहा। परिणामस्वरूप नई पीढ़ी अपनी जड़ों से कटती जा रही है।

 

यदि युवा पीढ़ी को भारतीय गौरवशाली इतिहास और साहित्य का ज्ञान नहीं होगा, तो वे अतीत की गलतियों से भी सीख नहीं पाएंगे। इतिहास केवल बीती घटनाओं का वर्णन नहीं होता, बल्कि भविष्य निर्माण का मार्गदर्शक होता है। साहित्य मनुष्य को संवेदनशील बनाता है, विचारशील बनाता है और समाज के प्रति उत्तरदायी बनाता है। जो समाज अपने साहित्य और संस्कृति से कट जाता है, वह धीरे-धीरे नैतिक पतन की ओर बढ़ने लगता है।

 

आधुनिक हिंदी साहित्य के महान उपन्यासकारों ने भी समाज को दिशा देने का कार्य किया। मुंशी प्रेमचंद ने ‘गोदान’, ‘गबन’, ‘सेवासदन’ और ‘कर्मभूमि’ जैसे उपन्यासों में भारतीय समाज की वास्तविक समस्याओं को प्रस्तुत किया। देवकी नंदन खत्री की ‘चंद्रकांता’ ने हिंदी साहित्य को लोकप्रियता के नए आयाम दिए। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, फणीश्वर नाथ रेणु, जयशंकर प्रसाद और वृंदावनलाल वर्मा जैसे साहित्यकारों ने इतिहास, समाज और मानवीय मूल्यों को अपनी रचनाओं में जीवंत किया। नरेंद्र कोहली ने भारतीय पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं को आधुनिक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत किया।

 

इन महान साहित्यकारों की रचनाएँ केवल किताबें नहीं, बल्कि समाज निर्माण के उपकरण हैं। इनका अध्ययन युवाओं में राष्ट्रप्रेम, नैतिकता, सामाजिक संवेदनशीलता और सांस्कृतिक चेतना विकसित कर सकता है। इसलिए आवश्यकता है कि विद्यालयों और महाविद्यालयों में भारतीय साहित्य, इतिहास और संस्कृति का अध्ययन अनिवार्य किया जाए। प्राथमिक विद्यालयों से लेकर स्नातक स्तर तक विद्यार्थियों को भारतीय महाकाव्यों, नीति कथाओं, ऐतिहासिक ग्रंथों और श्रेष्ठ उपन्यासों का अध्ययन कराया जाना चाहिए।

 

साथ ही अभिभावकों और समाज की भी बड़ी जिम्मेदारी है। बच्चों को केवल मोबाइल देकर शांत कर देना समाधान नहीं है। परिवारों में पुस्तक पढ़ने की संस्कृति विकसित करनी होगी। घरों में साहित्यिक चर्चा, धार्मिक ग्रंथों का पाठ और इतिहास से जुड़े संवाद होने चाहिए। पुस्तकालयों, साहित्यिक मंचों और सांस्कृतिक आयोजनों को बढ़ावा देना आवश्यक है।

 

शासन और प्रशासन को भी इस दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए। विद्यालयों में पुस्तकालयों को समृद्ध बनाया जाए, साहित्यिक प्रतियोगिताएँ आयोजित हों, भारतीय संस्कृति पर आधारित कार्यक्रम संचालित किए जाएँ तथा सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूकता अभियान चलाए जाएँ। यदि तकनीक का उपयोग सकारात्मक दिशा में किया जाए तो वही मोबाइल ज्ञान और संस्कृति के प्रचार का प्रभावी माध्यम बन सकता है।

यह कहना गलत नहीं होगा कि भारतीय युवा पीढ़ी आज एक सांस्कृतिक संक्रमण के दौर से गुजर रही है। यदि समय रहते उन्हें भारतीय साहित्य, इतिहास और संस्कृति से नहीं जोड़ा गया तो आने वाले समय में सामाजिक संबंध, नैतिक मूल्य और सांस्कृतिक पहचान गंभीर संकट में पड़ सकती है। इसलिए परिवार, समाज, शिक्षा व्यवस्था और शासन—सभी को मिलकर युवा पीढ़ी को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ने का प्रयास करना होगा। तभी हम उन्हें दिशाहीन भौतिक दौड़ और आभासी आकर्षण से निकालकर एक संस्कारित, जागरूक और राष्ट्रनिष्ठ नागरिक बना सकेंगे।

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