*डॉ. गिरीश प्रसाद दीक्षित को मिला उत्कृष्ट वैज्ञानिक सम्मान 2026*

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ज्ञानचंद्र शुक्ला की रिपोर्ट

 

बांदा i     भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान, कानपुर को उनके द्वारा दलहन के आनुवंशिक सुधार कार्यों में उत्कृष्ट योगदान हेतु कृषि अनुसंधान गौरव सम्मान प्रदान किया गया। माननीय कृषि मंत्री श्री सूर्य प्रताप शाही जी ने उन्हें स्मृति चिन्ह, शॉल व सम्मान पत्र देकर उन्हें सम्मानित किया।

डॉ. गिरीश प्रसाद दीक्षित देश के प्रतिष्ठित कृषि वैज्ञानिक एवं दलहन अनुसंधान के अग्रणी विशेषज्ञ हैं, जिन्होंने उन्नत किस्मों के विकास तथा गुणवत्तायुक्त कृषि में उत्कृष्ट योगदान दिया है। तीन दशकों से अधिक की सेवा, नवाचार और नेतृत्व के माध्यम से उन्होंने कृषि विज्ञान एवं किसानों के कल्याण में विशिष्ट सेवाएँ प्रदान की हैं।

डॉ. गिरीश प्रसाद दीक्षित का जन्म 28 अक्टूबर 1966 को वाराणसी (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उन्होंने 1993 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। वर्तमान में वे भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद – भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान, कानपुर के निदेशक के रूप में कार्यरत हैं।

उन्होंने दालों की 30 से अधिक उच्च उपज देने वाली किस्में विकसित की हैं, जिनमें मटर की लोकप्रिय किस्में – अमन, IPFD 10-12, विकास, प्रकाश, आदर्श, IPFD 11-5, IPFD 6-3 और IPF 4-9 शामिल हैं। इसके अलावा उन्होंने चने की 12 उन्नत प्रजातियाँ (मेघना के लक्षण युक्त, अधिक प्रोटीन वाली) तथा पीली चितेरी मटर प्रजातियों 5 डेज विकसित की, जो तेलहन के उत्कृष्ट बीजों में शामिल हैं। उनका अनुसंधान मसूर की प्रजातियों – प्रबल 3 और विकास, दोहरे उद्देश्य वाली मूंग की किस्म IPFD 10-12 तथा निचले वाली किस्म अमन – किसानों और व्यापारियों में अत्यंत लोकप्रिय हैं। इन प्रयासों से देश में दलहन उत्पादन की स्थिरता बढ़ी है और पीली मटर के आयात में उल्लेखनीय कमी आई है।

उन्होंने 2015 से 2023 तक राष्ट्रीय चना कार्यक्रम का नेतृत्व परियोजना समन्वयक (चना) के रूप में किया। इस दौरान उन्नत उत्पादन क्षमता, तनाव सहनशीलता, बाजार-उन्मुख गुण, मशीन कटाई उपयुक्तता तथा प्रबंधन कार्यक्रमों के क्रियान्वयन पर विशेष ध्यान दिया गया। भारत में चना उत्पादन 2015 के 7.33 मिलियन टन से बढ़कर 2022 में 13.70 मिलियन टन के रिकॉर्ड स्तर तक पहुँच गया, जो 80 प्रतिशत से अधिक वृद्धि दर्शाता है। देश के दलहन आत्मनिर्भरता में डॉ. गिरीश प्रसाद दीक्षित द्वारा विकसित किस्मों का प्रमुख योगदान है।

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