सुशील कुमार मिश्रा की रिपोर्ट
बांदा। बुंदेलखंड की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारने और स्थानीय स्तर पर सुपर स्पेशियलिटी इलाज उपलब्ध कराने के बड़े सरकारी दावों के बीच अरबों रुपये की लागत से बना रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज आज खुद सवालों के घेरे में खड़ा दिखाई दे रहा है। कागजों में अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस यह संस्थान जमीनी हकीकत में मरीजों के लिए राहत केंद्र बनने के बजाय महज “रेफर सेंटर” बनकर रह गया
सरकार लगातार स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार, जीरो टॉलरेंस और सस्ती चिकित्सा व्यवस्था के दावे करती रही है। लेकिन मेडिकल कॉलेज पहुंचने वाले मरीजों और तीमारदारों का आरोप है कि यहां गंभीर इलाज के बजाय मरीजों को झांसी, कानपुर या लखनऊ रेफर कर देना आम बात बन चुकी है। डाटा उठा कर चेक कर सकते हैं।।
स्थानीय लोगों का कहना है कि करोड़ों की मशीनें और संसाधन होने के बावजूद उनका उपयोग सीमित है कूड़ा बन कर रह गयीं हैं, जिससे मेडिकल कॉलेज का उद्देश्य ही सवालों में आ गया है।
मेडिकल कॉलेज की बदहाल व्यवस्थाओं को लेकर सबसे ज्यादा सवाल प्रभारी प्रिंसिपल की प्रशासनिक क्षमता पर उठ रहे हैं। आरोप है कि लगातार शिकायतों, अव्यवस्थाओं और डॉक्टरों की मनमानी के बावजूद कोई ठोस सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए।
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों तक कई बार शिकायतें पहुंचने के बावजूद कार्रवाई न होना प्रशासनिक शिथिलता की ओर इशारा करता है।
मरीजों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि मेडिकल कॉलेज में तैनात कई डॉक्टर सरकारी ड्यूटी से ज्यादा निजी प्रैक्टिस में सक्रिय रहते हैं व बाहर निजी अस्पतालों में ज्यादा ध्यान देते हैं व खूब धन कमा रहे हैं । मरीजों को निजी क्लीनिकों तक ले जाने के लिए कथित तौर पर दलाल तंत्र सक्रिय होने की भी चर्चा है।
चौंकाने वाली बात यह है कि कई निजी क्लीनिक आवश्यक मानकों और फायर एनओसी के बिना संचालित बताए जाते हैं, फिर भी लाइसेंस जारी होने से निगरानी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मेडिकल कॉलेज में तैनात डॉक्टरों द्वारा कॉलेज में किए गए अल्ट्रासाउंड और उन्हीं डॉक्टरों से जुड़े निजी संस्थानों में किए गए अल्ट्रासाउंड का पिछले दो वर्षों का रिकॉर्ड खंगाला जाए तो वास्तविक स्थिति स्वतः सामने आ सकती है।
सरकार द्वारा सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने के लिए प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्रों को बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन आरोप है कि कई बार डॉक्टर मरीजों को वहां भेजने के बजाय बाहर की महंगी और कथित कमीशन आधारित दवाएं लिखते हैं।
जागरूक तीमारदारों का आरोप है कि जन औषधि केंद्र की बात करने पर उन्हें तंज सुनने पड़ते हैं और कथित रूप से कहा जाता है — “इलाज कराना है या राजनीति करनी है, ज्यादा जानकारी है तो मरीज को बाहर ले जाइए।”
यदि ये आरोप सही हैं तो यह न केवल सरकारी नीति की अवहेलना बल्कि गरीब मरीजों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी है।
सूत्रों के अनुसार, मेडिकल कॉलेज प्रशासन और कुछ डॉक्टरों के खिलाफ समय-समय पर विभिन्न अधिकारियों को शिकायतें भेजी गईं, लेकिन अब तक किसी प्रभावी दंडात्मक कार्रवाई की जानकारी सामने नहीं आई। कार्रवाई के अभाव ने कथित लापरवाही को बढ़ावा दिया है और जिम्मेदारों के हौसले बुलंद बताए जा रहे हैं।
जीरो टॉलरेंस का दावा यहीं क्यों फेल?
सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब सरकार स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता और सख्ती की बात करती है तो फिर मेडिकल कॉलेज जैसे बड़े संस्थान में अव्यवस्थाएं क्यों कायम हैं?
क्या जिम्मेदारी सिर्फ निचले स्तर की है या निगरानी तंत्र भी पूरी तरह निष्क्रिय हो चुका है?
