अनिल सक्सेना की रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश के हालिया बजट में कृषि क्षेत्र को राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानते हुए कई महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं। बजट में सिंचाई सुविधाओं के विस्तार, कृषि अवसंरचना के विकास, फसल उत्पादकता बढ़ाने और किसानों की आय में वृद्धि पर विशेष जोर दिया गया है। यह स्पष्ट करता है कि सरकार कृषि को केवल उत्पादन तक सीमित न रखकर उसे लाभकारी और टिकाऊ बनाने की दिशा में काम करना चाहती है।

कृषि अर्थशास्त्र विभाग की अध्यक्ष डॉ. पुष्पा
बाँदा कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय में कृषि अर्थशास्त्र विभाग की अध्यक्ष डॉ. पुष्पा ने उत्तर प्रदेश बजट 2026–27 का विश्लेषण करते हुए बताया की राज्य सरकार ने कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों को निरंतर प्राथमिकता दी है। राज्य का कुल बजट आकार लगभग ₹9 लाख करोड़ से अधिक आँका गया है, जो पिछले वर्ष के ₹8.08 लाख करोड़ (2025–26) से ₹ 1 लाख करोड़ की वृद्धि दर्शाता है। इससे स्पष्ट है कि सरकार विकास के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है।
कृषि, सिंचाई, पशुपालन, डेयरी और ग्रामीण विकास को मिलाकर लगभग 10–11% बजटीय हिस्सेदारी का अनुमान दिखाई देता है। सिंचाई और जल प्रबंधन पर बड़ा जोर वर्षा पर निर्भरता कम करने की दिशा में सकारात्मक कदम है। गन्ना क्षेत्र में सहकारी चीनी मिलों के आधुनिकीकरण के लिए लगभग ₹260 करोड़ से अधिक का प्रावधान किसानों के लिए लाभकारी माना जा रहा है। वहीं e-KCC (किसान क्रेडिट कार्ड) पर ₹3 लाख करोड़ कृषि ऋण लक्ष्य डिजिटल और त्वरित वित्तीय सहायता की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।
हालाँकि, दीर्घकालिक दृष्टि से कृषि अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर और स्पष्ट व सशक्त निवेश भविष्य की उत्पादकता और प्रतिस्पर्धा के लिए आवश्यक है। कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों की भूमिका को मजबूत करना प्रदेश की कृषि क्षमता को नई दिशा दे सकता है।
मुख्य बिंदु
• कुल बजट 2026–27: ₹9 लाख करोड़
• कृषि व संबद्ध क्षेत्र: ~ 10–11% हिस्सेदारी (अनुमानित)
• सिंचाई व जल संसाधन: ~ ₹20 हजार करोड़+ संकेत
• गन्ना/चीनी मिल आधुनिकीकरण: ~ ₹260 करोड़+
• कृषि ऋण लक्ष्य: ~ ₹3 लाख करोड़ (e-KCC फोकस)
• R&D: प्रावधान मौजूद, पर और विस्तार की आवश्यकता
इन प्रावधानों से स्पष्ट है कि बजट का झुकाव अवसंरचना सुदृढ़ीकरण और आय विविधीकरण की ओर है। सिंचाई पर खर्च वर्षा निर्भरता कम करने में सहायक होगा, वहीं पशुपालन और डेयरी छोटे किसानों के लिए नियमित नकदी आय का माध्यम बन सकते हैं। ग्रामीण सड़कें, वेयरहाउस और मंडी सुधार किसानों को बेहतर मूल्य दिलाने की दिशा में उपयोगी कदम हैं। फिर भी, बदलते कृषि परिदृश्य में कृषि अनुसंधान एवं विकास (R&D) का महत्व और बढ़ जाता है। उन्नत बीज, डिजिटल कृषि, मृदा स्वास्थ्य और जलवायु अनुकूल तकनीकें भविष्य की उत्पादकता तय करेंगी। कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसे नकारा नहीं जा सकता; इस क्षेत्र में क्रमिक और लक्षित निवेश बढ़ना प्रदेश की दीर्घकालिक कृषि प्रतिस्पर्धा को और मजबूत कर सकता है।
यह बजट कृषि को “सहारा” देता है, पर “उछाल” देने की क्षमता तब और सशक्त होगी जब अनुसंधान, तकनीक और किसान-केंद्रित बाज़ार सुधार को और प्राथमिकता मिले। सरकार के प्रयास सराहनीय हैं, और यदि आज ज्ञान-आधारित निवेश को थोड़ा और विस्तार मिले, तो कल किसान केवल जीविकोपार्जन नहीं बल्कि समृद्धि और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन सकता है—यही किसी भी बजट की वास्तविक सफलता मानी जाएगी। यही संतुलित दृष्टिकोण प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था को टिकाऊ समृद्धि की ओर ले जा सकता है।
