शिव शर्मा की रिपोर्ट
पं. शिवकुमार शास्त्री कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र, सुरगी, राजनांदगांव में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत प्रथम वर्ष के विद्यार्थियों को मशरूम उत्पादन के बारे में महाविद्यालय के प्राध्यापक डाॅ. नितिन कुमार तुर्रे द्वारा विस्तारपर्वूक प्रदर्शन करके प्रायोगिक कार्य कराया जा रहा है जिसमें उन्हें छत्तीसगढ़ राज्य में मशरूम की खाये जाने वाली विभिन्न प्रजातियो, मशरूम में पाये जाने वाली पोषक तत्वों, विभिन्न बिमारियों के निदान में मशरूम का उपयोग, खाने योग्य एवं जहरीला मशरूम की पहचान, मशरूम उत्पादन हेतु स्वस्थ्य बीज की पहचान, मशरूम उत्पादन हेतु माध्यम तैयार करने, माध्यम को उपचारित करने, माध्यम में बीज मिलाकर बंडल तैयार करने, बंडलों को कक्ष में टांगने, बंडलों के झिल्ली को निकालने, सिंचाई किये जाने, पूर्ण विकसित मशरूम की पहचान, मशरूम तुड़ाई, मशरूम में कीड़े एवं बिमारियों की पहचान, मशरूम उत्पादन, मशरूम का विपणन ताजे एवं सुखा कर किये जाने, ताजे मशरूम का विभिन्न व्यंजन बनाये जाने के संबंध में, मशरूम का विभिन्न उत्पाद बनाकर बेचने के तरीकों, मशरूम का स्पाॅन (बीज) बनाना, सामूहिक मशरूम उत्पादन कर जोखिम कम करते हुए अधिक आय प्राप्त करने के सबंध में जानकारी दी जा रही है। डाॅ. नितिन कुमार तुर्रे ने बताया कि मशरूम एकमात्र ऐसा आहार है जो भारतीय आहार में प्रोटीन की कमी को पूरा कर सकता है। भारत जैसे देश में जहां अधिकांश जनसंख्या शाकाहारी हैं मशरूम के पौष्टिक एवं औषधीय गुणों की वजह से मशरूम के उत्पादन एवं उपयोग की प्रचुर सम्भावनायें है । मशरूम को वैज्ञानिक तरीकों से उगाने के लिये विभिन्न माध्यमों जैसे गेहूं या चावल का भूसा, गोबर तथा कई अन्य कार्बनिक व अकार्बनिक पदार्थों को मिलाकर तैयार की हुई कृत्रिम खाद का उपयोग किया जाता है । मशरूम की खेती और जैविक खेती एक ही सिक्के के दो पहलू हैं मशरूम की खेती के अवशेष जैविक खेती के उपयोग में आ सकते हैं और जैविक खेती के विभिन्न कारक जैसे गोबर की खाद, कम्पोस्ट, नीम की खली और खेत में बचे अवशेष मशरूम की खेती के लिये उत्यंत उपयोगी है । आज के आधुनिक युग में विदेशों में मशरूम का प्रयोग दवाइयों को बनाने में भी किया जा रहा है। मशरूम में स्टार्च न होने के कारण यह मधुमेह रोगियों का आदर्श भोज्य पदार्थ है । वसा की मात्रा नगण्य होने तथा कोलेस्ट्राल रोधी पदार्थ की उपस्थिति की वजह से मशरूम उच्च रक्तचाप एवं मोटापे से पीड़ित लोगों का आदर्श भोजन है । मशरूम में पाये जाने वाले प्यूरीन या पाइरीमिडीन, क्यूनोनस व टर्पिनाइड पदार्थ हानिकारक जीवाणु रोधी क्षमता रखते हैं । शरीर में कुछ विषैले पदार्थ एकत्रित होकर शाररिक कोशिकाओं को नष्ट करके कैंसर जैसे रोगों को जन्म देते हैं । मशरूम में अनेक ऐसे तत्व मौजूद होते हैं जो इन विषैले पदार्थ को निष्क्रिय करके शरीर की रक्षा करते हैं । मशरूम में फोलिक अम्ल पाया जाता है जो शरीर में खून बनाने में सहायक होता है । मशरूम की सब्जी बनाकर खाया जा सकता है साथ ही उसके विभिन्न व्यंजन व प्रसंस्कृत उत्पाद जैसे पापड़ बड़ी बेचकर लाभ कमाया जा सकता है। उक्त प्रायोगिक कक्षाओ में 126 विद्यार्थीगण उत्साहपूर्वक भाग लेकर मशरूम उत्पादन व विपंणन के तकनीक सीख रहे हैं ताकि इसे व्यवसाय के रूप में अपना सकें। ताजे मशरूम को बेच कर भी धन कमाया जा सकता है । इसकी सब्जी बनाकर खाया जाता है। विद्यार्थियों द्वारा आयस्टर मशरूम उत्पादन कर उसे कृषको, वरिष्ठ विद्यार्थियो व स्टाफ मे बेचकर धन कमाने के गुर सीखे गये। विद्यार्थियों द्वारा मशरुम के विभिन्न व्यंजन जैसे – मशरूम पकौडे, समोसें, मशरूम सेडविच, मशरूम बिरयानी, मशरूम पुलाव, मशरुम बडा, मशरुम चिली, मशरूम पराठा, मशरूम की कुकिज आदि बनाया जा रहा है । साथ ही इसके विभिन्न प्रसंस्कृत उत्पाद जैसे – मशरूम का अचार, मशरूम बडी, मशरूम पापड़ आदि बनाना भी सिखाया जा रहा है ताकि उक्त उत्पादो को बेचकर अतिरिक्त आमदनी ली जा सके। मशरूम को सुखाकर उसका पावडर बनाकर भी सुरक्षित रखा जा सकता है। मशरूम में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन होने के कारण यह गर्भवती महिलाओं व कुपोषण से ग्रसित बच्चों को खिलाया जा सकता है। आयस्टर मशरूम की अनेक प्रजातियाॅ है, जो छŸाीसगढ़ क्षेत्र में जुलाई से अप्रैल माह तक आसानी से उगाई जा सकती है । इस मशरूम को अनेक प्रकार के कृषि अवशेष (पैराकुट्टी, गेहूँ भूसा, सोयाबीन भूसा, सरसों भूसा आदि) में आसानी से उगाया जा सकता है । आयस्टर मशरूम को आसानी से सुखाकर लंबे समय तक संरक्षित किया जा सकता है । आयस्टर मशरूम की उत्पादन क्षमता (70-100 प्रतिशत जैविक क्षमता) अन्य सभी मशरूम से ज्यादा है । किस्मों में विविधता के कारण लगभग सालभर उत्पादन कर सकते हैं । उत्पादन तकनीक सरल एवं सस्ती है । कम क्षेत्र में अधिक लाभ होता है । सालभर में 5-6 फसलें ली जा सकती है ।
