सुशील कुमार मिश्रा की रिपोर्ट
बांदा। नरैनी। शहीद-ए-आज़म भगत सिंह जी का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। 28 सितंबर 1907 को जन्मे इस महानायक ने 23 वर्ष की अल्पायु में जो बलिदान दिया, वह सदियों तक युवाओं को प्रेरित करता रहेगा। जलियांवाला बाग का रक्तरंजित दृश्य देखने के बाद जिस बालक ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह की ज्वाला अपने सीने में धारण की, वही बालक आगे चलकर भारत का अमर शहीद बना।
आज के युवाओं के सामने जीवन के अनेकों विकल्प हैं, लेकिन दुर्भाग्य से अधिकांश युवा सोशल मीडिया, नशे और फैशन की चकाचौंध में उलझते जा रहे हैं। ऐसे समय में भगत सिंह की जयंती हमें याद दिलाती है कि युवाओं की असली ताक़त देश और समाज निर्माण में है। नरैनी निवासी समाजसेवी उमेश तिवारी, जो गौसेवा और निस्वार्थ भाव से समाजसेवा में निरंतर जुटे रहते हैं, कहते हैं कि यदि युवा अपनी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में लगाएँ तो कोई शक्ति भारत को विश्वगुरु बनने से नहीं रोक सकती।
भगत सिंह ने कहा था—“क्रांति की तलवार विचारों की धार से तेज होती है।” यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, क्योंकि देश को बंदूक की नहीं बल्कि जागरूकता, शिक्षा और सेवा की क्रांति की आवश्यकता है। समाजसेवी उमेश तिवारी का मानना है कि युवाओं के अंदर देशभक्ति की ज्वाला जगाना ही समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
23 मार्च 1931 को जब भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने हंसते-हंसते फांसी का तख़्ता चूमा, तो उन्होंने भारत के युवाओं को यह सबक दिया कि जीवन की लंबाई नहीं बल्कि गहराई मायने रखती है। उनकी अंतिम हुंकार—“इंकलाब जिंदाबाद”—आज भी देश के कोने-कोने में गूंज रही है।
नरैनी निवासी समाजसेवी उमेश तिवारी कहते हैं कि युवाओं को चाहिए कि वे शहीदों की जयंती पर केवल माल्यार्पण तक सीमित न रहें, बल्कि उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लें। नशे, भटकाव और स्वार्थ से दूर होकर शिक्षा, सेवा और सद्भावना का मार्ग चुनें। यही शहीद भगत सिंह के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी और यही आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगी।
“देश के लिए जीना ही सबसे बड़ा धर्म है।”
“इंकलाब जिंदाबाद – अमर शहीद अमर रहेंगे।”
