*ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था पर सरकारी नियंत्रण अनौचित्यपूर्ण या जनहितकारी ?*
विजय द्विवेदी
भारत को गांवों का देश कहा जाता है। आज भी देश की बड़ी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है और कृषि तथा उससे जुड़े कार्यों पर निर्भर है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में लगभग 6,49,481 गांव और 9,935 नगर हैं। इतनी विशाल आबादी के लिए उपलब्ध सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति चिंता का विषय है। स्वास्थ्य केवल एक सेवा नहीं बल्कि प्रत्येक नागरिक का मूल अधिकार है, किंतु वर्तमान समय में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं का लगातार महंगा होना और ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों के बीच चिकित्सा सुविधाओं की गहरी असमानता देश के समक्ष गंभीर चुनौती बन चुकी है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार पूरे देश में लगभग 23,500 सरकारी अस्पताल संचालित हैं। इन अस्पतालों में कार्यरत चिकित्सकों की संख्या आवश्यकता की तुलना में बहुत कम है। अधिकांश विशेषज्ञ और अनुभवी चिकित्सक जिला अस्पतालों तथा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में तैनात हैं, जबकि बड़ी संख्या में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और ग्रामीण चिकित्सालय पर्याप्त चिकित्सकों के अभाव में संचालित हो रहे हैं। भवन मौजूद हैं, लेकिन डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं। परिणामस्वरूप ग्रामीण जनता को छोटी-बड़ी बीमारी के लिए भी कई किलोमीटर दूर जिला मुख्यालय या निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता है।
उत्तर प्रदेश की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। प्रदेश में 214 जिला एवं विशिष्ट चिकित्सालय, 976 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 3,757 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तथा हजारों उप-स्वास्थ्य केंद्र संचालित हैं, लेकिन उपलब्ध चिकित्सकों की संख्या आवश्यकता से काफी कम है। अधिकांश डॉक्टर जिला अस्पतालों या बड़े स्वास्थ्य केंद्रों पर केंद्रित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के अनेक स्वास्थ्य केंद्रों पर अधिकांशतः डॉक्टर नहीं मिलते, केवल औपचारिक रूप से व्यवस्था चलती रहती है। यह केवल आंकड़ों की बात नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर पर स्थिति कई स्थानों पर इससे भी अधिक गंभीर दिखाई देती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी का सीधा प्रभाव गरीब, किसान, मजदूर और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर पड़ता है। बीमारी की स्थिति में उन्हें पहले परिवहन की समस्या का सामना करना पड़ता है, फिर लंबी कतारों में घंटों इंतजार करना पड़ता है। गंभीर रोग होने पर निजी अस्पतालों की ओर जाना उनकी मजबूरी बन जाती है, जहां इलाज का खर्च कई बार परिवार की पूरी आर्थिक व्यवस्था को प्रभावित कर देता है। अनेक परिवार इलाज के लिए कर्ज लेने या अपनी संपत्ति बेचने तक को विवश हो जाते हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं के बढ़ते व्यावसायीकरण ने भी इस समस्या को और जटिल बना दिया है। पिछले कुछ दशकों में निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम की संख्या तेजी से बढ़ी है। आधुनिक चिकित्सा तकनीक और बेहतर सुविधाओं के कारण इन अस्पतालों की उपयोगिता से इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन उपचार की अत्यधिक लागत आम नागरिक की पहुंच से बाहर होती जा रही है। सामान्य बीमारी से लेकर गंभीर ऑपरेशन तक के लिए लाखों रुपये खर्च हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा प्राप्त करना कठिन हो जाता है।
यदि हम लगभग एक शताब्दी पहले की ग्रामीण व्यवस्था पर दृष्टि डालें तो अधिकांश गांवों में स्थानीय वैद्य, जड़ी-बूटी विशेषज्ञ और अनुभव के आधार पर उपचार करने वाले लोग उपलब्ध रहते थे। वे गांव के लोगों को व्यक्तिगत रूप से जानते थे और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उपचार करते थे। अनेक वनस्पतियों और पारंपरिक औषधियों का ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता रहा। आज भी कई ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे अनुभवी लोग मौजूद हैं जो सामान्य बीमारियों के लिए घरेलू उपचार, औषधीय पौधों और प्राथमिक चिकित्सा की जानकारी रखते हैं। कई मामलों में लोगों को इससे लाभ भी मिलता है।
इसके अतिरिक्त ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे लोग भी कार्यरत हैं जिन्हें आम बोलचाल में “गांव का डॉक्टर” कहा जाता है। इनमें से अनेक के पास औपचारिक चिकित्सा शिक्षा नहीं होती, इसलिए उन्हें प्रायः “झोलाछाप डॉक्टर” कहा जाता है। यह भी सच है कि बिना उचित प्रशिक्षण के गंभीर रोगों का उपचार करना जोखिमपूर्ण हो सकता है और इससे मरीज की जान को खतरा भी हो सकता है। इसलिए ऐसे व्यक्तियों द्वारा जटिल चिकित्सा करना उचित नहीं माना जा सकता। दूसरी ओर यह भी एक सामाजिक वास्तविकता है कि जहां सरकारी डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं और अस्पतालों तक पहुंच कठिन है, वहां ग्रामीण जनता सबसे पहले इन्हीं स्थानीय डॉक्टर कहे जाने वाले लोगों के ही पास जाती है क्योंकि यह लोग गांव व आसपास के लोगों के आत्मीय जन होते हैं उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि से परिचित होते हैं और हित-अनहित के प्रति सामाजिक व व्यवहारिक रूप से जवाबदेह भी होते हैं इसके अतिरिक्त यह ग्रामीण डाक्टर (झोलाछाप) कम खर्च में तत्काल प्राथमिक सहायता उपलब्ध करा देते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में सामान्य बुखार, सर्दी, खांसी, दस्त, चोट या अन्य छोटी बीमारियों का उपचार स्थानीय स्तर पर बहुत कम लागत में हो जाता है। वहीं यही मरीज यदि शहर के निजी अस्पताल पहुंच जाए तो जांच, दवाइयों और भर्ती सहित खर्च कई गुना बढ़ जाता है। निश्चित रूप से गंभीर बीमारियों के लिए विशेषज्ञ चिकित्सकों और आधुनिक अस्पतालों की आवश्यकता होती है, लेकिन प्राथमिक स्तर की स्वास्थ्य सेवाओं को गांव के नजदीक सुलभ बनाना भी उतना ही आवश्यक है।
ऐसी परिस्थितियों में आवश्यकता इस बात की है कि सरकार ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक व्यावहारिक और सुदृढ़ बनाए। सबसे पहले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर पर्याप्त संख्या में नियमित डॉक्टर, नर्स, फार्मासिस्ट और आवश्यक दवाइयों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। डॉक्टरों की ग्रामीण क्षेत्रों में नियुक्ति के साथ-साथ उनकी नियमित उपस्थिति की प्रभावी निगरानी भी होनी चाहिए। टेलीमेडिसिन, मोबाइल मेडिकल यूनिट और डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार करके दूरस्थ गांवों तक विशेषज्ञ परामर्श पहुंचाया जा सकता है।
साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षों से प्राथमिक स्तर पर लोगों की सहायता कर रहे अनुभवी व्यक्तियों की पहचान कर उन्हें व्यवस्थित प्रशिक्षण देने की संभावना पर भी विचार किया जा सकता है। यदि ऐसे लोगों को केवल प्राथमिक चिकित्सा, स्वास्थ्य जागरूकता, रोग पहचान, टीकाकरण, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य तथा आपातकालीन स्थिति में मरीज को समय पर रेफर करने का प्रशिक्षण दिया जाए और उनके कार्य का स्पष्ट दायरा निर्धारित किया जाए, तो वे ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था के सहायक के रूप में उपयोगी भूमिका निभा सकते हैं। इससे बिना प्रशिक्षित चिकित्सा के जोखिम को कम करते हुए गांवों में प्राथमिक स्वास्थ्य सहायता की उपलब्धता बेहतर हो सकती है।
इसके साथ ही आयुष पद्धतियों—आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी—के प्रशिक्षित चिकित्सकों की सेवाओं का भी ग्रामीण क्षेत्रों में प्रभावी उपयोग किया जा सकता है। भारत की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में अनेक रोगों की रोकथाम, जीवनशैली सुधार और सामान्य स्वास्थ्य संरक्षण की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आधुनिक चिकित्सा और पारंपरिक चिकित्सा के समन्वय से ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक मजबूत बनाया जा सकता है।
स्वास्थ्य के साथ-साथ शिक्षा तक समान पहुंच भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। जिस प्रकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अत्यधिक निजीकरण गरीब परिवारों के लिए चुनौती बनता जा रहा है, उसी प्रकार स्वास्थ्य सेवाओं का बढ़ता व्यावसायीकरण सामाजिक असमानता को बढ़ाता है। एक स्वस्थ और शिक्षित समाज ही किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति होता है। इसलिए सरकार, समाज, चिकित्सा समुदाय और स्थानीय संस्थाओं को मिलकर ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी जिसमें गांव का गरीब व्यक्ति भी सम्मानपूर्वक, समय पर और कम खर्च में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा प्राप्त कर सके।
अंततः यह कहना उचित होगा कि भारत के समग्र विकास का मार्ग गांवों से होकर गुजरता है। यदि ग्रामीण नागरिक स्वस्थ रहेंगे तभी कृषि, अर्थव्यवस्था और सामाजिक विकास मजबूत होगा। सरकारी स्वास्थ्य तंत्र को सुदृढ़ करना, ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सकों की उपलब्धता बढ़ाना, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार करना, प्रशिक्षित स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का नेटवर्क विकसित करना तथा अनावश्यक व्यावसायीकरण पर नियंत्रण रखना समय की प्रमुख आवश्यकता है। स्वास्थ्य सेवा का उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, बल्कि मानव जीवन की रक्षा और समाज को निरोग बनाना होना चाहिए। यही दृष्टिकोण भारत को अधिक स्वस्थ, समतामूलक और सशक्त राष्ट्र बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।

विजय द्विवेदी
