राघवेन्द्र शर्मा उरई (जालौन)
जनपद मुख्यालय उरई में समाजवादी पार्टी (सपा) का सरकार विरोधी प्रदर्शन उस समय आम जनता के लिए आफत बन गया, जब कलेक्ट्रेट की तरफ बढ़ा जुलूस पूरी तरह बेकाबू हो गया। ‘लाल टोपी’ पहने कार्यकर्ताओं की भारी भीड़ ने न सिर्फ यातायात व्यवस्था को ध्वस्त किया, बल्कि कलेक्ट्रेट परिसर में भी भारी अफरा-तफरी का माहौल पैदा कर दिया। इस हंगामे के बीच घंटों तक शहरवासी और दूर-दराज से आए फरियादी खुद को बेबस और पीड़ित महसूस करते रहे।
🚩 गैस सिलेंडर के कटआउट लेकर निकले, रास्ते में बदले तेवर
पार्टी कार्यालय से शुरू हुए इस जुलूस में बड़ी संख्या में सपा कार्यकर्ता हाथों में झंडे, सरकार विरोधी पोस्टर और गैस सिलेंडर के कटआउट लेकर महंगाई व अन्य मुद्दों पर विरोध जताने निकले थे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, शुरुआत में तो मार्च शांतिपूर्ण था, लेकिन जैसे-जैसे कारवां कलेक्ट्रेट की तरफ बढ़ा, कार्यकर्ताओं के तेवर आक्रामक और उग्र होते चले गए।
🛑 चक्काजाम: एम्बुलेंस और स्कूल बसें फंसीं, तमाशबीन बनी रही पुलिस
जुलूस के चलते उरई की मुख्य धमनियों (सड़कों) पर वाहनों के पहिये पूरी तरह थम गए। सड़कों पर अनुशासनहीनता का आलम यह था कि:
स्कूली बच्चे और मरीज बेहाल: भीषण जाम में कई स्कूल बसें और आपातकालीन एम्बुलेंस घंटों फंसी रहीं।
दुकानदारों में दहशत: स्थानीय व्यापारियों का आरोप है कि दुकानों के सामने उग्र नारेबाजी और भीड़ के दबाव के कारण उन्हें सुरक्षा की चिंता सताने लगी।
राहगीरों से नोकझोंक: भीड़ का रास्ता रोकने या निकलने की कोशिश करने वाले राहगीरों के साथ धक्का-मुक्की और तीखी बहस की खबरें भी सामने आईं।
🏛️ कलेक्ट्रेट में बढ़ा तनाव, फरियादियों में खौफ
असली हंगामा कलेक्ट्रेट परिसर में देखने को मिला। जब उग्र नारेबाजी करती भीड़ सुरक्षा घेरे को दरकिनार कर भीतर तक घुस गई।
फरियादियों की आपबीती: “हम अपनी जमीन के विवाद की अर्जी लेकर आए थे, लेकिन कलेक्ट्रेट का माहौल देखकर डर गए। चारों तरफ सिर्फ हंगामा और धक्का-मुक्की हो रही थी। अधिकारी भी बेबस नजर आ रहे थे।” – रामआसरे, कलेक्ट्रेट आए ग्रामीण
❓ प्रशासन की ढिलाई पर उठे गंभीर सवाल
इतनी बड़ी संख्या में जुटी भीड़ और हंगामे के बाद अब स्थानीय जिला व पुलिस प्रशासन की तैयारियों पर उंगलियां उठने लगी हैं:
क्या खुफिया तंत्र को इस आक्रामक प्रदर्शन की भनक नहीं थी?
क्या प्रदर्शन के लिए रूट और कार्यकर्ताओं की संख्या की सीमा तय नहीं की गई थी?
कानून-व्यवस्था को ठेंगा दिखाने वाले उपद्रवियों पर क्या पुलिस प्रशासन कोई सख्त कार्रवाई करेगा?
फिलहाल, प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि स्थिति को नियंत्रित कर लिया गया है, लेकिन शहर के प्रबुद्ध वर्ग और व्यापारियों ने अराजकता फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कदम उठाने की मांग तेज कर दी है।
📢 बर्निंग क्वेश्चन: लोकतंत्र या भीड़तंत्र?
उरई की इस घटना ने एक बार फिर यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए आम जनता के अधिकारों को कुचलना जायज है? विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन जब यह आम नागरिक की आजादी और सुरक्षा को बंधक बना ले, तो इसे लोकतंत्र कहा जाए या ‘भीड़तंत्र’? इसका जवाब राजनीतिक दलों को तय करना होगा।
