मंदसौर/नाहरगढ(तुलसीराम राठौर)– 1 सितंबर 2025 के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने पुराने शिक्षकों के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
यहाँ इस पूरे घटनाक्रम और इसके तकनीकी पहलुओं का संक्षिप्त विश्लेषण दिया गया है।संकट का मुख्य कारण: TET की अनिवार्यता।शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) 2009 के तहत शिक्षकों के लिए पात्रता परीक्षा (TET) अनिवार्य की गई थी। हालांकि, पहले यह माना जाता था कि यह नियम नई नियुक्तियों पर लागू होगा। सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय ने इस स्थिति को बदल दिया है।व्यापक प्रभाव: इस निर्णय से अकेले मध्य प्रदेश के 70,000 और देश भर के लगभग 25 लाख शिक्षकों की नौकरी पर तलवार लटक गई है।
पूर्वव्यापी प्रभाव बनाम भविष्यलक्षी: वर्तमान में यह निर्णय उन शिक्षकों पर भी लागू हो रहा है जो 2010 (RTE लागू होने) से पहले नियुक्त हुए थे। संघ की मांग है कि इसे ‘भविष्यलक्षी’ (Prospectively) बनाया जाए, यानी केवल भविष्य की नियुक्तियों पर लागू हो।
शिक्षक संघ की प्रमुख मांगें राज्य सभा सांसद बंशीलाल गुर्जर को सौंपे गए ज्ञापन में तीन मुख्य समाधान सुझाए गए है।कानूनी संरक्षण: केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका (Review Petition) दायर करे।
विधायी संशोधन: यदि आवश्यक हो, तो संसद में RTE अधिनियम 2009 में संशोधन किया जाए ताकि पुराने शिक्षकों को इस नियम से छूट मिल सके।
सेवा सुरक्षा: दशकों से सेवा दे रहे शिक्षकों की आजीविका को कानूनी पेचीदगियों से बचाया जाए।
प्रतिनिधिमंडल में प्रान्त,संभाग और जिला स्तर के प्रमुख पदाधिकारी व शिक्षक उपस्थित रहे जिसमे रामचंद्र लोहार (प्रांतीय सह मीडिया प्रभारी), शंकरलाल आँजना (संभागीय अध्यक्ष), विक्रम शर्मा (जिला अध्यक्ष), कांतिलाल राठौर (जिला कोषाध्यक्ष), जिला उपाध्यक्ष रतनलाल चौहान, मनीष बैरागी, श्रीमती कविता सोनी, गणपतलाल राठौर (जिला कार्यकारिणी सदस्य), जितेंद्रसिंह राणा (ब्लॉक सह संगठन मंत्री), रघुवीर सिंह सिसोदिया (ब्लॉक अध्यक्ष), शिवनारायण मंडवारिया (तहसील अध्यक्ष), लोकेंद्र सिंह देवड़ा (नगर उपाध्यक्ष) एवं शिक्षक प्रतिनिधी अनिल पुरोहित, जीतेन्द्रसिंह सिसोदिया, सुरेन्द्र गुप्ता और सुरेश कौशिक शामिल थे।
सांसद का रुख
माननीय सांसद महोदय ने सकारात्मक रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट के फैसले और RTE नियमों के दस्तावेजों की मांग की है। यह संकेत देता है कि इस मुद्दे को राज्यसभा में उठाने की तैयारी की जा रही है, जो कि विधायी समाधान की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है।यह मामला अब केवल एक जिला स्तर का मुद्दा न रहकर एक राष्ट्रीय बहस का विषय बनता जा रहा है, क्योंकि यह सीधे तौर पर लाखों अनुभवी शिक्षकों के सम्मान और आजीविका से जुड़ा है। यह जानकारी जिलाध्यक्ष विक्रम शर्मा कयामपुर ने दी।
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