सनत कुमार बुधौलिया की रिपोर्ट
जालौन के बहुचर्चित डबल मर्डर केस में अदालत ने ऐसा फैसला सुनाया है, जिसने सियासी गलियारों से लेकर आम जनता तक हलचल मचा दी है। Allahabad High Court ने पूर्व विधायक छोटे सिंह को बड़ा झटका देते हुए उनकी जमानत अर्जी पूरी तरह खारिज कर दी है। इतना ही नहीं, कोर्ट ने सजा निलंबन (सस्पेंशन ऑफ सेंटेंस) की मांग को भी सिरे से ठुकरा दिया।
यह मामला कोई ताजा नहीं, बल्कि साल 1994 का है, जब जालौन के चुरखी थाना क्षेत्र में दिनदहाड़े गोलियों की तड़तड़ाहट ने सनसनी फैला दी थी। हमलावर घर में घुसे और अंधाधुंध फायरिंग कर दी। इस खौफनाक वारदात में राजकुमार और जगदीश शरण की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि एक अन्य व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो गया था। उस वक्त यह मामला पूरे इलाके में चर्चा का केंद्र बन गया था।
करीब तीन दशक तक चली लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 11 सितंबर 2025 को ट्रायल कोर्ट ने छोटे सिंह को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, उम्मीद थी कि शायद राहत मिल जाए, लेकिन यहां भी किस्मत ने साथ नहीं दिया।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि इस केस में मौजूद प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही मजबूत और भरोसेमंद है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सिर्फ इसलिए कि गवाह रिश्तेदार हैं, उनकी गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता। साथ ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य साक्ष्य भी आरोपी की संलिप्तता की ओर साफ इशारा करते हैं।
बचाव पक्ष ने यह दलील दी थी कि एफआईआर में छोटे सिंह का नाम नहीं था, लेकिन कोर्ट ने इसे भी नकार दिया। अदालत ने कहा कि एफआईआर में नाम न होना किसी आरोपी को बरी करने का आधार नहीं बन सकता, खासकर जब अन्य साक्ष्य मजबूत हों।
सबसे अहम बात यह रही कि अदालत ने कहा—जब ट्रायल कोर्ट किसी को दोषी ठहरा देती है, तो उसकी “निर्दोषता की धारणा” खत्म हो जाती है। ऐसे में सजा पर रोक लगाने के लिए ठोस कारण जरूरी होते हैं, जो इस मामले में नहीं मिले।
इस फैसले के बाद अब साफ है कि पूर्व विधायक छोटे सिंह को फिलहाल जेल में ही रहना होगा। जमानत की उम्मीद पर पानी फिर चुका है और यह फैसला एक बार फिर यह संदेश देता है कि कानून के शिकंजे से बचना आसान नहीं।
