लोकेंद्र भुवाल की रिपोर्ट
बेमेतरा । बेमेतरा जिले की ग्राम पंचायत बरबसपुर ने जल संरक्षण और टिकाऊ कृषि के क्षेत्र में एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। ग्रीष्मकालीन धान जैसी अत्यधिक जल-आवश्यक फसल के स्थान पर दलहन एवं तिलहन फसलों को अपनाकर ग्राम ने न केवल जल संकट की चुनौती का समाधान किया है, बल्कि आसपास के गांवों के लिए भी प्रेरणा का मार्ग प्रशस्त किया है। इसी क्रम में आज ग्राम पंचायत बरबसपुर में वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा देने एवं जल संरक्षण को लेकर एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक में जिला प्रशासन की अपील, कृषि विभाग की सतत निगरानी तथा ग्राम के सभी कृषकों के सामूहिक प्रयासों से आए सकारात्मक बदलावों की सराहना की गई।
गत वर्ष बरबसपुर में ग्रीष्मकालीन धान का रकबा कुल कृषि रकबे का 90 प्रतिशत से अधिक (लगभग 545 एकड़) था, जिससे भूजल स्तर पर गंभीर दबाव पड़ रहा था। किंतु इस वर्ष कृषकों की जागरूकता और प्रशासनिक मार्गदर्शन के चलते यह रकबा घटकर 10 एकड़ से भी कम रह गया है। यह परिवर्तन जिले में जल संरक्षण की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। इस वर्ष ग्राम के कृषकों ने धान के स्थान पर चना, गेहूं, मसूर, तुअर जैसी दलहनी एवं अन्य वैकल्पिक फसलों को अपनाया है। इन फसलों में कम पानी की आवश्यकता होती है, जिससे सिंचाई पर निर्भरता कम हुई है और कृषि अधिक टिकाऊ एवं लाभकारी बनी है। साथ ही, मिट्टी की उर्वरता और कृषकों की आय में सुधार की भी संभावनाएं बढ़ी हैं।
बैठक में ग्राम सरपंच, सचिव, पंचगण, प्रगतिशील एवं महिला कृषक, बड़ी संख्या में ग्रामवासी, ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी तथा किसान साथी उपस्थित रहे। सभी ने इस सामूहिक प्रयास को भविष्य में भी निरंतर जारी रखने तथा अन्य गांवों को भी इस दिशा में प्रेरित करने का संकल्प लिया।
*इस अवसर पर कृषि विभाग के डिप्टी डायरेक्टर श्री मोरध्वज डड़सेना ने जानकारी देते हुए बताया कि रबी वर्ष 2025-26 के लिए जिले में 1.60 लाख हेक्टेयर का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जिसके विरुद्ध अब तक 59 हजार हेक्टेयर में दलहनी, तिलहनी एवं अन्य वैकल्पिक फसलों की बुवाई की जा चुकी है। उन्होंने बताया कि कृषकों को शासन की योजनाओं के तहत दलहन–तिलहन फसलों के बीज अनुदान पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। जिले में ग्रीष्मकालीन धान का कोई कार्यक्रम नहीं है तथा आने वाले समय में दलहन–तिलहन क्षेत्र विस्तार की व्यापक संभावनाएं हैं।*
बरबसपुर की यह पहल स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि सही मार्गदर्शन, सामूहिक इच्छाशक्ति और फसल विविधीकरण के माध्यम से जल संरक्षण के साथ-साथ कृषि को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाया जा सकता है। यह मॉडल न केवल बेमेतरा जिले, बल्कि पूरे प्रदेश के लिए एक प्रेरणादायी उदाहरण है।
