ऐप और ऑनलाइन एंट्री के बोझ तले दबा शिक्षक, पढ़ाई के लिए समय निकाले या विभागीय आदेशों का पालन करे?

 

          अभिवादन एक्सप्रेस

 

 शिव शर्मा की रिपोर्ट

साल्हेवारा /खैरागढ़== शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने और सरकारी योजनाओं की निगरानी के नाम पर आए दिन जारी होने वाले नए-नए ऑनलाइन ऐप, पोर्टल और विभागीय आदेश अब शिक्षकों के लिए परेशानी का सबब बनते जा रहे हैं। स्थिति यह है कि विद्यालय में बच्चों को पढ़ाने के लिए नियुक्त शिक्षक अपना अधिकांश समय मोबाइल पर ऑनलाइन एंट्री, जानकारी अपलोड करने और विभिन्न प्रकार के रिकॉर्ड तैयार करने में व्यतीत कर रहे हैं। ऐसे में शिक्षा की मूल जिम्मेदारी यानी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए पर्याप्त समय कैसे मिले, यह बड़ा सवाल बन गया है।

 

एक व्यथित शिक्षक ने संवाददाता के समक्ष अपनी पीड़ा साझा करते हुए कहा कि आए दिन किसी न किसी नए ऐप में एंट्री करने का फरमान जारी हो जाता है। कभी किसी योजना की जानकारी, कभी किसी सर्वे का विवरण तो कभी अलग-अलग पोर्टल पर आंकड़े अपलोड करने की जिम्मेदारी। पूरा दिन मोबाइल और ऑनलाइन कार्यों में ही गुजर जाता है। शिक्षक का कहना है कि हम शिक्षक हैं, बाबू या ऑनलाइन ऑपरेटर नहीं, लेकिन मौजूदा व्यवस्था में शिक्षण कार्य से ज्यादा समय विभागीय ऑनलाइन औपचारिकताएं पूरी करने में लग रहा है।

 

सबसे चिंताजनक स्थिति उन छोटे विद्यालयों की है, जहां महज दो शिक्षक पदस्थ हैं। ऐसी स्थिति में यदि एक शिक्षक दिनभर मोबाइल पर विभागीय ऑनलाइन कार्यों में उलझा रहे तो दूसरे शिक्षक के भरोसे पूरे विद्यालय के बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी रह जाती है। सवाल यह है कि सीमित शिक्षक संख्या वाले विद्यालयों में शिक्षण व्यवस्था का संतुलन आखिर कैसे बना रहेगा?

 

डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य शिक्षा को सरल बनाना है, शिक्षकों को उलझाना नहीं। रिकॉर्ड और आंकड़ों का महत्व अपनी जगह है, लेकिन इसके लिए शिक्षण कार्य को पीछे छोड़ना उचित नहीं माना जा सकता। यदि प्रत्येक नई व्यवस्था का बोझ सीधे शिक्षकों पर ही डाल दिया जाएगा तो कक्षा में बच्चों को पढ़ाने का समय लगातार प्रभावित होने की आशंका बनी रहेगी।

 

शिक्षक संगठनों से भी अपेक्षा है कि वे इस विषय को गंभीरता से उठाएं तथा शासन-प्रशासन से अनावश्यक ऐप आधारित प्रविष्टियों, बार-बार मांगी जाने वाली जानकारियों और गैर-शैक्षणिक कार्यों को सीमित करने की मांग करें।

 

आखिरकार सवाल व्यवस्था से है—शिक्षक बच्चों का भविष्य गढ़ें या दिनभर मोबाइल पर सरकारी रिकॉर्ड भरते रहें? शिक्षा व्यवस्था में तकनीक का उपयोग जरूर हो, लेकिन शिक्षक की मूल भूमिका और विद्यार्थियों की पढ़ाई की कीमत पर नहीं।

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