सबकी आँखों में खटकता ब्राम्हण

 

डॉ0 ओ0पी0 मिश्र की ✍️  से

हमारे घर पर हिंदी और अंग्रेजी को मिलकर कुछ सात समाचार पत्र आते हैं। इसमें एक समाचार पत्र दोपहर में आता है इतने समाचार पत्र क्यों आते हैं? उसका कारण भी आप जानते हैं आज शनिवार को मैं जब समाचार पत्रों को पढ़ना और देखना शुरू किया तो मुझे पता नहीं क्यों एक शंका हुई कि कल शुक्रवार को जो जंतर मंतर पर सवर्ण समाज का प्रोटेस्ट होने वाला था क्या वह स्थगित हो गया था? क्योंकि इस तरह का कोई समाचार अखबारों में नहीं था ना ही किसी बड़े चैनल जिसे आजकल गोदी मीडिया कहा जाता है, उस पर था? मन में यह जानने की जिज्ञासा हुई कि आखिर हुआ क्या? मैं लखनऊ, दिल्ली तथा प्रयागराज में अपने पत्रकार मित्रों को फोन किया तो पता चला कि आंदोलन तो हुआ है।
जब मन नहीं माना तो हमने ग्रोक और चैट जीपीटी से सवाल किया तो पता चला कि पहले जंतर मंतर पर प्रोटेस्ट की अनुमति दी गई थी लेकिन बाद में रामलीला ग्राउंड कर दिया गया। इसको लेकर आयोजनकर्ताओ में आक्रोश था। क्योंकि उनको लग रहा था कि इस तरह तो पुलिस प्रशासन आंदोलन को बाटकर कमजोर करना चाहता है। अब मेरा यहां सीधा सा यह सवाल है कि अगर उक्त प्रोटेस्ट में पाच हजार भी आदमी जुड़े थे या वहां एकत्रित हुए थे तो क्या यह समाचार नहीं था। छोटे-छोटे धरना प्रदर्शन के समाचार तीन-तीन कालम में छप जाते हैं। लेकिन भारत की राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर या रामलीला ग्राउंड में हुआ या प्रोटेस्ट समाचार का रूप क्यों नहीं ले पाया। अगर सोशल मीडिया ना होती तो शायद यह पता ही नहीं नहीं चलता कि दिल्ली में सवर्ण समाज का कोई बड़ा आंदोलन यूजीसी बैंक तथा आरक्षण की समीक्षा या आरक्षण के विरोध में हुआ। जो हमने या हम जैसे तमाम लोगों ने पत्रकारिता शुरू की थी तो बताया गया था की NEWS का मतलब होता है नॉर्थ, ईस्ट, वेस्ट और साउथ तो फिर क्या यह खबर किसी भी एंगिल से अखबार और चैनल वालों को नहीं मिली या उन्हें मिलने नहीं दी गई या फिर ऐसे निर्देश, आदेश, संदेश भेजे गए की समाचार को प्रकाशित या प्रसारित नहीं करना है । मैं यहां यूजीसी रोल बैंक या आरक्षण की समीक्षा पर चर्चा नहीं कर रहा हूं मैं तो यह जानने का प्रयास कर रहा हूं कि इतनी बड़ी खबर को किसके कहने पर दबाया और छुपाया गया। जबकि यह समाचार उन लोगों का था जिसके लोग 90% लोग सत्ता दल का समर्थन करते हैं क्या सरकार को समर्थन करने का यही सिला सवर्ण समाज को मिलना चाहिए। संघ भाजपा तथा सरकार के 90% भक्त या अंधभक्त इसी समाज से आते हैं। यानी उक्त आंदोलन में ब्राह्मण, क्षत्रिय, राजपूत वैश्य वगैरह के ही लोग शामिल थे। लेकिन सरकार ने उनकी कोई परवाह नहीं की क्यों? इस क्यों का जवाब तो आना ही चाहिए और सरकार को बताना भी चाहिए कि उसने एक अहम समाचार को पेज वन या लास्ट पेज का समाचार क्यों नहीं बनने दिया। अब भाजपा के आईटी सेल की तरफ से कहा जा रहा है कि सवर्ण के आंदोलन की धार को कुंद करने के लिए ही लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी संसद मार्ग थाने पीड़ित साहिल को लेकर गए थे ताकि यह न्यूज़ दब जाए और राहुल गांधी हाईलाइट हो जाए। आईटी सेल की इस बात में इसलिए बिल्कुल दम नहीं है क्योंकि राहुल गांधी कोई एक सामान्य सांसद नहीं बल्कि नेता प्रतिपक्ष है और सीधा प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को टारगेट करते हैं । इसलिए वे तो खबर बनेंगे ही और पेज वन की खबर बनेंगे। लेकिन यहां मेरा सवाल फिर वही है कि क्या जंतर मंतर की भीड़ या विजुअल्स यह नहीं बता रहे हैं कि यह भी एक बड़ी खबर थी। इस सब के पीछे कहीं सरकार की मंशा आंदोलन को कुचलना या हासिये पर डालने की तो नहीं है। क्योंकि जंतर मंतर से जिस तरह की विजुअल और वीडियो आई हैं वह परेशान करने वाली है। वैसे अब जंतर मंतर खाली हो चुका है लेकिन एक सवाल छोड़ गया है कि अगर लोगों को जवाब नहीं मिला उनकी बात को अनसुना किया गया तथा आंदोलन को ताकत से खत्म करने की कोशिश की गई या फिर पार्टी लाइन के बाहर न जाने की अपील की गई तो क्या यह किसी नए रूप मे सामने नहीं आएगा । आखिर लोगों के आक्रोश और गुस्से को आप कब तक दबा कर रखेंगे। वैसे 21 अगस्त के जंतर मंतर आंदोलन को केवल आरक्षण विरोध को ही देखना काफी नहीं है। इसके पीछे यूजीसी 2026 का एक बड़ा कारण है वैसे इसे इंडिया टुडे ने मुख्यतः अपर कास्ट समूह का शो ऑफ स्ट्रेंथ बताया है। वैसे कोई माने या ना माने लेकिन राजनीतिक दृष्टि से यह कार्यवाही आंदोलन को कमजोर करने के बजाय उसके लिए “हमारी आवाज दबाई जा रही है” वाला नैरेटिव पैदा कर सकती है । वैसे मैं यह तो नहीं कहूंगा कि यह आंदोलन एक चुनावी सुनामी का रूप ले सकता है लेकिन राजनीतिक दलों के लिए यह एक चेतावनी अवश्य है और मीडिया के लिए भी एक संदेश कि अगर हम मां बहन की गाली नहीं देंगे तो क्या आप हमें अपने समाचार में जगह नहीं देंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *