अनिल सक्सेना की रिपोर्ट
बाँदा-रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज के एसोसिएट प्रोफेसर,कैलाश हॉस्पिटल के संचालक, नाक कान गला एवं कैंसर रोग विशेषग्य डाक्टर भूपेंद्र सिंह ने एक बार फिर अपनी सूझ बूझ से एक मासूम की जान बचाली है ।
खबर के मुताबिक बाँदा के नरैनी क्षेत्र धोबन पुरवा के रहने वाले डेढ़ वर्ष के मासूम मयंक पुत्र स्व0 मनीज के गले के अंदर त्रिशूल डिजाइन का पीतल का लॉकेट चला गया था और खाने की नली में फंस गया था ।
मयंक की माँ जयंती मयंक को छतरपुर और झांसी के कई अस्पतालों में ले कर गई लेकिन सभी ने लॉकेट निकालने में असमर्थता दिखाई और मयंक को वापस कर दिया गुरुवार को जयंती अपने मासूम बच्चे को ले कर बाँदा के इंद्रा नगर स्थित कैलाश मल्टी स्पेशलिटी हॉस्पिटल एन्ड ई एन टी सेंटर पहुंची जहाँ नाक कान गला एवम कैंसर रोग विशेषग्य डाक्टर भूपेंद्र सिंह ने बड़ी सूझ बूझ के साथ मासूम की खाने की नली में फंसा लॉकेट बगैर चीरा लगाए दूरबीन पद्दति से निकाल दिया, जिससे मासूम की जान बच गई ।
मयंक की माँ ने बताया कि मंगलवार की शाम मयंक घर मे खेल रहा रहा कि अचानक उल्टी करने लगा जब मैंने देखा तो उसके गले मे पीतल का त्रिशूल जैसे आकार का लॉकेट फंस गया था मैंने हांथ से निकालने की कोशिश की तो वो और अंदर चला गया मैं तुरन्त मयंक को ले कर छतरपुर गई लेकिन वहाँ से झांसी रेफर कर दिया गया मैन पहले झांसी में एक प्राइवेट डाक्टर को दिखाया उसने एक्सरे कराने के बाद लॉकेट निकालने से मना कर दिया फिर मैं मयंक की झांसी मेडिकल कॉलेज ले गई वहाँ एक दिन भर्ती रखने के बाद वहाँ के डॉक्टरों ने ग्वालियर के लिए रेफर कर दिया तब मैं परेशान हो गई तभी मुझे मेरे कुछ रिश्तेदारों ने बाँदा के कैलाश हॉस्पिटल ले जाने को कहा और मैं गुरुवार को अपने बच्चे को ले कर कैलाश हॉस्पिटल आ गई यहाँ डाक्टर भूपेन्द्र सर ने मेरे बच्चे को भर्ती कर लिया और शुक्रवार को मेरे बच्चे के गले के अंदर खाने की नली में फंसा त्रिशूल लॉकेट बगैर चीरा लगाए दूरबीन पद्दति से निकाल दिया जिससे मेरे बच्चे की जान बच गई ।
इस ऑपरेशन के बारे में डाक्टर भूपेन्द्र सिंह ने बताया कि बच्चे की उम्र बहुत कम है और ये पीतल का लॉकेट दोनों तरफ से नुकीला है जिसकी वजह से वो बच्चे की खाने की नली में फंस गया था और दोनों तरफ से खाने की नली को जख्मी कर दिया था निकालने में खाने की नली फट सकती थी जिससे बच्चे की जान को खतरा था ये आपरेशन अपने आप मे इतना जटिल था कि इसमें आपरेशन करते वक्त भी बच्चे की जान जा सकती थी शायद इसी गम्भीरता तो देखते हुए छतरपुर और झांसी के डॉक्टरों ने त्रिशूल निकालने से इनकार कर दिया होगा।
डाक्टर भूपेंद्र सिंह ने आगे बताया कि जब ये बच्चा उनके पास आया तो उन्होंने भी बच्चे को कहीं बड़े शहर ले जाने की सलाह दी लेकिन जब बच्चे के परिजन नहीं माने तो हम लोगों ने आपरेशन की तैयारी शुरू कर दी और ईश्वर की कृपा से लगभग डेढ़ घण्टे की मेहनत के बाद बच्चे के गले मे किसी तरह का चीरा लगाए बगैर दूरबीन पद्दति से बच्चे के गले के अंदर खाने की नली में फंसा पीतल के त्रिशूल लॉकेट निकालने में कामयाब हो गए बच्चा अब पूरी तरह स्वस्थ है ।
इस ऑपरेशन में डाक्टर भूपेंद्र सिंह के साथ डाक्टर पंकज एनेस्थीसिया,डाक्टर अरुण ई एम ओ, मोहित ओटी स्टाफ, आशुतोष, नीरज पूजा आदि ने सहयोग किया ।
