शिव शर्मा की रिपोर्ट
ग्राम सोमनी में 60 साल पुराने स्टॉप डेम की नहर-नाली को राजस्व विभाग और भू-माफियाओं की साजिश से नक्शे से ‘गायब’ कर दिया गया। अब उसी पर कॉलोनी काटने की तैयारी है – यानी अब सरकारी पानी भी बिकाऊ हो गया है!
*किसानों के लिए नियम, माफियाओं के लिए सुविधा!*
जहां आम किसान नक्शा बटांकन के लिए महीने भर से आवेदन दे रहा है, उसे जवाब मिलता है – “बरसात का मौसम है, नहीं हो सकता।”
लेकिन चौंकाने वाली बात ये कि एक ही दिन में भू-माफियाओं को न सिर्फ नक्शा मिला, बल्कि बटांकन, सीमांकन और रजिस्ट्री भी हो गई।
*10 दिन – 2 रजिस्ट्री – एक ही जमीन, दो सौदे!*
संजय कोसरे और निखिल कोसरे की पारिवारिक विवादों में फंसी कीमती कृषि भूमि को दलालों ने महज़ ₹2.5 करोड़ में हथिया लिया।
ज़मीन का वास्तविक बाजार मूल्य ₹9 करोड़ से अधिक बताया जा रहा है।
10 दिन बाद उसी ज़मीन को गांव के ही नगरसेठ को ₹9 करोड़ में बेच दिया गया!
दोनों रजिस्ट्री में सरकारी दर दिखाकर स्टांप ड्यूटी की चोरी और राजस्व का बड़ा नुकसान किया गया।
*”नहर? कौन सी नहर?” – नक्शे में जादूगरी, 60 साल पुरानी नहर गायब!*
स्टॉप डेम से निकलने वाली नहर, जो पूरे गांव की सिंचाई व्यवस्था का आधार थी, उसे नक्शे से पूरी तरह ‘गायब’ कर दिया गया।
राजस्व विभाग की कलम चली और नहर प्राइवेट ज़मीन बन गई। अब वहां अवैध प्लॉटिंग शुरू है।
*कॉलोनी के बदले प्यासे खेत – आने वाली गर्मी में पानी के लिए हाहाकार तय!*
गांव के इकलौते जलाशय से जुड़ी यह नहर अगर खत्म हो गई, तो गर्मियों में गांव में भयंकर जल संकट होगा। किसान पहले से ही परेशान हैं, अब सिंचाई का साधन भी छीना जा रहा है।
बैक डेट का खेल – ‘वर्तमान में काम नहीं हो सकता’, लेकिन पुरानी तारीख में सब कुछ संभव!
आम किसान को कहा जाता है – *“बरसात है, नाप-जोख नहीं हो सकता।”*
लेकिन भू-माफियाओं के लिए बैक डेट में आवेदन तैयार, और उसी दिन नक्शा पास, बटांकन तैयार और रजिस्ट्री फ़ाइनल!
यही नहीं – दूसरी रजिस्ट्री भी महज़ 10 दिन बाद, और उसमें भी वही खेल।
*ग्रामीणों में आक्रोश – “अगर नहर बिक सकती है, तो कल बांध भी बिकेगा?”*
ग्रामीणों का कहना है कि यह सिर्फ ज़मीन हड़पने की साजिश नहीं, बल्कि पूरे राजस्व तंत्र की गिरावट का उदाहरण है।
ग्राम पंचायत, सरपंच और ग्रामीणों ने कलेक्टर, विधायक डॉ. रमन सिंह और सांसद संतोष पांडेय को शिकायत करने की तैयारी की जा रही है।
