विजय द्विवेदी
माधौगढ़, जालौन। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 भले ही अभी दूर हों, लेकिन राजनीतिक दलों ने अभी से अपनी रणनीति तैयार करना शुरू कर दिया है। बुंदेलखंड की महत्वपूर्ण सीटों में शामिल 219 माधौगढ़ विधानसभा क्षेत्र में भी चुनावी सरगर्मियां तेज होती दिखाई देने लगी हैं। बहुजन समाज पार्टी द्वारा समय से पहले ब्राह्मण चेहरे के रूप में आशीष पांडे को प्रत्याशी घोषित किए जाने के बाद अन्य दलों, विशेषकर समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी में संभावित प्रत्याशियों को लेकर चर्चाओं और समीक्षाओं का दौर तेज हो गया है।
स्थानीय स्तर पर सोशल मीडिया और व्यक्तिगत संपर्कों के माध्यम से कराए गए एक समीक्षात्मक सर्वे ने क्षेत्र की राजनीतिक दिशा को लेकर नई बहस छेड़ दी है। हालांकि यह सर्वे किसी अधिकृत एजेंसी द्वारा नहीं कराया गया, फिर भी इससे यह संकेत अवश्य मिल रहे हैं कि जनता के बीच कौन से चेहरे चर्चा में हैं और किस दल के भीतर टिकट की दौड़ सबसे अधिक दिलचस्प बन चुकी है।
*बसपा ने खेला ब्राह्मण कार्ड*
माधौगढ़ विधानसभा क्षेत्र सामाजिक और जातीय समीकरणों की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां ब्राह्मण, ठाकुर, पिछड़ा वर्ग और दलित मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। ऐसे में बहुजन समाज पार्टी द्वारा आशीष पांडे को प्रत्याशी घोषित करना एक सोची-समझी रणनीति माना जा रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बसपा ने ब्राह्मण मतदाताओं को साधने के साथ-साथ समाजवादी पार्टी के परंपरागत समीकरणों को प्रभावित करने की कोशिश की है। बसपा के इस कदम के बाद समाजवादी पार्टी के भीतर भी मजबूत और सर्वमान्य चेहरे की तलाश तेज हो गई है।
*समाजवादी पार्टी में हरिओम उपाध्याय सबसे आगे*
स्थानीय और व्यक्तिगत माध्यमों से किए गए सर्वे में समाजवादी पार्टी के संभावित प्रत्याशियों को लेकर लोगों की राय ली गई। इस समीक्षा में पूर्व प्रत्याशी राघवेंद्र सिंह भदौरिया, हरिओम उपाध्याय, राजा केशवेंद्र सिंह और दीपराज गुर्जर के नाम प्रमुख रूप से सामने आए।
सर्वे के अनुसार लगभग 50 प्रतिशत लोगों ने हरिओम उपाध्याय को समाजवादी पार्टी का सबसे मजबूत और उपयुक्त प्रत्याशी बताया। लोगों का मानना है कि हरिओम उपाध्याय की क्षेत्र में सक्रियता, जनसंपर्क और सामाजिक कार्यक्रमों में भागीदारी उन्हें अन्य दावेदारों से आगे खड़ा करती है।
दूसरे स्थान पर राजा केशवेंद्र सिंह को समर्थन मिला। समर्थकों का मानना है कि उनका राजनीतिक अनुभव और पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र में अभी भी मजबूत है। वहीं पूर्व प्रत्याशी राघवेंद्र सिंह भदौरिया को तीसरे स्थान पर पसंद किया गया।
दीपराज गुर्जर का नाम भी चर्चा में रहा, लेकिन सर्वे में उन्हें अपेक्षाकृत कम समर्थन प्राप्त हुआ। वहीं करीब 25 प्रतिशत लोगों ने किसी भी प्रत्याशी पर स्पष्ट राय नहीं दी या अनिर्णय की स्थिति जताई। इससे यह भी संकेत मिलता है कि समाजवादी पार्टी के भीतर टिकट को लेकर अंतिम स्थिति अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
*भाजपा में सबसे ज्यादा दावेदार, मुकाबला रोचक*
भारतीय जनता पार्टी में संभावित प्रत्याशियों की सूची सबसे लंबी दिखाई दे रही है। वर्तमान विधायक मूलचंद्र सिंह निरंजन के अलावा शिक्षक नेता अशोक कुमार राठौर, रामपुरा ब्लॉक प्रमुख अजीत सिंह सेंगर, शीतल कुशवाहा तथा अन्य स्थानीय नेताओं के नाम चर्चा में हैं।
समीक्षात्मक सर्वे में सबसे अधिक समर्थन अजीत सिंह सेंगर को मिला। लोगों का कहना है कि ब्लॉक प्रमुख के रूप में उनकी सक्रियता, ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत पकड़ और संगठनात्मक क्षमता उन्हें भाजपा का मजबूत चेहरा बनाती है। विशेष रूप से युवा और ग्रामीण मतदाताओं के बीच उनकी स्वीकार्यता बेहतर बताई जा रही है।
वर्तमान विधायक मूलचंद्र सिंह निरंजन को लोगों ने दूसरे नंबर का पसंदीदा प्रत्याशी बताया, लेकिन यह अंतर काफी बड़ा बताया गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता विरोधी माहौल और स्थानीय मुद्दों को लेकर जनता का एक वर्ग बदलाव चाहता है, जिसका असर सर्वे में दिखाई दिया।
हालांकि संतराम सिंह सेंगर के बारे में चर्चा है कि वे कालपी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं, इसके बावजूद उन्हें तीसरे पसंदीदा चेहरे के रूप में समर्थन मिला। इससे स्पष्ट है कि क्षेत्र में उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता अब भी बनी हुई है।
शिक्षक नेता अशोक कुमार राठौर को चौथे स्थान पर समर्थन प्राप्त हुआ। शिक्षा और कर्मचारी वर्ग में उनकी मजबूत पहचान को इसका प्रमुख कारण माना जा रहा है। वहीं शीतल कुशवाहा को पांचवें पसंदीदा प्रत्याशी के रूप में लोगों ने समर्थन दिया।
इसके अलावा बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी सामने आए जिन्होंने किसी भी संभावित प्रत्याशी पर भरोसा न जताते हुए नकारात्मक या अनिर्णय की प्रतिक्रिया दी। यह स्थिति भाजपा के लिए एक संकेत मानी जा रही है कि टिकट चयन में छोटी सी चूक भी चुनावी समीकरण बिगाड़ सकती है।
*सोशल मीडिया सर्वे की विश्वसनीयता पर भी सवाल*
हालांकि यह पूरा सर्वे सोशल मीडिया और व्यक्तिगत माध्यमों से किया गया, इसलिए इसकी निष्पक्षता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि संभावित प्रत्याशियों ने अपने समर्थकों से अधिक से अधिक संख्या में सर्वे में भाग लेने की अपील की होगी, जिससे परिणाम प्रभावित हो सकते हैं।
इसके बावजूद राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि सोशल मीडिया अब जनमत का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। ऐसे सर्वे भले अंतिम सत्य न हों, लेकिन यह जरूर संकेत देते हैं कि किस नेता की चर्चा अधिक है और जनता किस चेहरे को लेकर सकारात्मक सोच रखती है।
*जातीय समीकरण होंगे निर्णायक*
माधौगढ़ विधानसभा क्षेत्र में हमेशा से जातीय समीकरण चुनावी परिणामों को प्रभावित करते रहे हैं। भाजपा जहां पिछड़ा वर्ग और गैर-यादव वोट बैंक को मजबूत बनाए रखने की कोशिश करेगी, वहीं समाजवादी पार्टी ब्राह्मण, यादव और अन्य वर्गों के बीच संतुलन साधने की रणनीति पर काम करती दिखाई दे रही है।
बसपा द्वारा ब्राह्मण प्रत्याशी उतारने से मुकाबला और दिलचस्प हो गया है। यदि बसपा ब्राह्मण मतों में सेंध लगाने में सफल रहती है तो इसका सीधा असर समाजवादी पार्टी पर पड़ सकता है। वहीं भाजपा संगठन और सरकारी योजनाओं के आधार पर अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखने का प्रयास करेगी।
*फिलहाल कौन दिख रहा मजबूत?*
सर्वे के आधार पर यदि वर्तमान स्थिति का आकलन किया जाए तो भाजपा की ओर से अजीत सिंह सेंगर और समाजवादी पार्टी की ओर से हरिओम उपाध्याय सबसे अधिक पसंद किए जाने वाले चेहरे बनकर उभरे हैं। हालांकि चुनाव में अभी लंबा समय बाकी है और आने वाले महीनों में राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदल सकती हैं।
टिकट वितरण, दलों के अंदरूनी समीकरण, जातीय संतुलन, स्थानीय मुद्दे और जनता के बीच सक्रियता—ये सभी कारक आगामी चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाएंगे। फिलहाल इतना तय है कि 2027 का माधौगढ़ विधानसभा चुनाव बेहद रोचक और बहुकोणीय मुकाबले के रूप में सामने आने वाला है।
