शिव शर्मा की रिपोर्ट
*दो बार बहाल करने के बाद अब उसी शिक्षक को डीईओ ने फिर किया निलंबित, लेन-देन के आरोपों से गरमाया मुद्दा*
*डेढ़ साल से चल रही जांच, लेकिन अब तक नहीं हुई मेडिकल बोर्ड से पुष्टि*
*छत्तीसगढ़ दिव्यांग संघ ने की लोक शिक्षण संचनालय में की शिकायत*
राजनांदगांव।15 जनवरी, जिले के शिक्षा विभाग में फर्जी दिव्यांगता प्रमाण पत्र के सहारे नौकरी पाने और फिर निलंबन-बहाली के खेल का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पूरी प्रशासनिक व्यवस्था और अधिकारियों की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। टांकापारा स्थित शासकीय प्राथमिक शाला में पदस्थ सहायक शिक्षक विकास लाटा के फर्जीवाड़े के मामले में प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) प्रवास बघेल की भूमिका अब संदेह के घेरे में आ गई है। सवाल उठ रहे हैं कि जिस शिक्षक को डीईओ ने स्वयं निर्दोष मानकर दो बार बहाल किया, उसे अब अचानक तीसरी बार निलंबित क्यों कर दिया गया? क्या पूर्व में की गई बहाली किसी ‘लेन-देन’ का नतीजा थी?
*क्या है पूरा मामला*
मामले की शुरुआत छत्तीसगढ़ पैरेंट्स एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष क्रिष्टोफर पॉल की शिकायत से हुई थी। उन्होंने तत्कालीन डीईओ अभय जायसवाल और बाद में दुर्ग कमिश्नर से शिकायत की थी कि विकास लाटा ने फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र लगाकर नौकरी हासिल की है। कमिश्नर के आदेश पर तत्कालीन डीईओ ने जांच शुरू की और संतोषजनक जवाब न मिलने पर 02 अगस्त 2024 को विकास लाटा को निलंबित कर दिया था।
*नए डीईओ बघेल के आते ही बदला ‘खेल’*
जैसे ही वर्तमान प्रभारी डीईओ प्रवास बघेल ने पदभार संभाला, मामले का रुख बदल गया। आरोप है कि बिना किसी ठोस आधार या नई जांच रिपोर्ट के, डीईओ बघेल ने 24 अप्रैल 2025 को विकास लाटा को बहाल कर दिया। इतना ही नहीं, उनकी निलंबन अवधि को भी ‘सेवा काल’ मान लिया गया। इसके बाद 02 मई 2025 को एक संशोधित आदेश जारी कर विकास लाटा को उनकी मनपसंद जगह पर पदस्थापना भी दे दी गई।
बहाली को ढाल बनाकर व्हिसल-ब्लोअर पर ही केस
डीईओ द्वारा क्लीन चिट और बहाली मिलने के बाद शिक्षक विकास लाटा के हौसले इतने बुलंद हो गए कि उन्होंने शिकायतकर्ता क्रिष्टोफर पॉल के खिलाफ ही पुलिस अधीक्षक कार्यालय में प्रताड़ना की शिकायत दर्ज करा दी। उन्होंने दलील दी कि डीईओ ने जांच के बाद उन्हें निर्दोष पाया है।
*अचानक फिर निलंबन: यू-टर्न या मजबूरी?*
मामला तब और पेचीदा हो गया जब छत्तीसगढ़ दिव्यांग सेवा संघ ने हाल ही में इसकी लिखित शिकायत की। इसके बाद, दबाव में आते ही उन्हीं डीईओ प्रवास बघेल ने 03 जनवरी 2026 को विकास लाटा को पुनः आनन-फानन में निलंबित कर दिया।
*सवालों के घेरे में डीईओ की कार्यशैली*
अब इस पूरे घटनाक्रम ने प्रभारी डीईओ प्रवास बघेल को सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया है।
यदि विकास लाटा दोषी हैं, तो उन्हें अप्रैल और मई 2025 में बहाल कर मनपसंद पोस्टिंग क्यों दी गई?
और यदि वे निर्दोष थे (जैसा कि बहाली के समय माना गया), तो अब उन्हें दोबारा निलंबित क्यों किया गया?
इससे प्रतीत होता है की क्रिष्टोफर पॉल द्वारा संयुक्त संचालक को की गई शिकायत में लगाए गए ‘लेन-देन’ के आरोप क्या सही साबित हो रहे हैं?
*मूल जांच से भटकाया जा रहा ध्यान*
हैरत की बात यह है कि पिछले डेढ़-दो वर्षों से यह विवाद चल रहा है, लेकिन विभाग ने आज तक सबसे बुनियादी कदम नहीं उठाया। यह जांचने के लिए कि शिक्षक वास्तव में दिव्यांग है या नहीं, उसे मेडिकल बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत क्यों नहीं किया गया? केवल कागजी घोड़े दौड़ाकर निलंबन और बहाली का खेल खेला जा रहा है। इस मामले में
जानकारों का मानना है कि यदि मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच होती है, तो शिक्षक के साथ-साथ प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी पर भी गाज गिरना तय है। बार-बार आदेश बदलना, संदिग्ध बहाली और फिर निलंबन यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं विभागीय स्तर पर संरक्षण और भ्रष्टाचार का खेल चल रहा था, जिसे अब दबाने की कोशिश की जा रही है।
