मंदसौर/नाहरगढ (तुलसीराम राठौर)–
पूरा देश सनातन संस्कृति के सबसे बड़े और पावन पर्व दीपोत्सव यानी दीपावली के स्वागत की तैयारियों में जुटा है। बाजारों में रौनक है, घरों में सजावट हो रही है, हर परिवार अपने आंगन को रोशन करने और अपनों के साथ खुशियां बांटने के लिए उत्साहित है। लेकिन इसी उत्सव के बीच हमारे शहर की सड़कों पर एक ऐसी चिंताजनक प्रवृत्ति भी दिखाई दे रही है, जिसे समय रहते गंभीरता से समझना और रोकना बेहद आवश्यक है।
आजकल कुछ नवयुवाओं में तेज गति से वाहन चलाना, छोटे और व्यस्त मार्गों पर भी लापरवाहीपूर्वक वाहन दौड़ाना, दोपहिया वाहनों में तेज आवाज वाले साइलेंसर लगाकर पटाखों जैसी आवाज निकालना, अचानक तेज रफ्तार से आगे निकलना और सड़कों पर वाहनों को लहराते हुए चलाना मानो एक नया फैशन बनता जा रहा है। आखिर यह कैसा जुनून है? किसे प्रभावित करने के लिए युवा अपनी और दूसरों की जिंदगी को खतरे में डाल रहे हैं?
क्या कुछ क्षणों का रोमांच, सड़क पर अपनी गाड़ी की रफ्तार का प्रदर्शन और दूसरों के सामने हीरो बनने की चाह किसी अनमोल जीवन से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है?
एक घटना जिसने मुझे यह लेख लिखने के लिए विवश किया विगत रात्रि लगभग 10:15 बजे मैं दशरथ नगर से गांधी चौराहे की ओर आ रहा था। इसी दौरान एक नवयुवक अपनी कार को जिस तरह अनियंत्रित गति से सड़क पर दौड़ाते हुए, टेढ़े-मेढ़े ढंग से निकालकर ले गया, वह दृश्य अत्यंत भयावह था। एक क्षण के लिए ऐसा लगा कि शायद कोई बड़ी दुर्घटना घट सकती है। मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई और रोंगटे खड़े हो गए।
उस युवक ने न तो अपनी गति पर नियंत्रण रखा और न ही इस बात की परवाह की कि सड़क पर कोई दूसरा वाहन चालक, बुजुर्ग, महिला या छोटा बच्चा भी हो सकता है। आखिर उसके मन में एक बार भी यह विचार क्यों नहीं आया कि उसकी इस लापरवाही से किसी निर्दोष व्यक्ति की जान जा सकती थी? कोई गंभीर रूप से घायल हो सकता था और किसी हंसते-खेलते परिवार की खुशियां हमेशा के लिए छिन सकती थीं।
यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि हमारे समाज के सामने खड़ा एक गंभीर सवाल है।
युवाओं से हाथ जोड़कर विनय दुबेला की एक विनम्र अपील
मेरे युवा साथियों! आपसे हाथ जोड़कर निवेदन है कि सड़क को अपनी बहादुरी दिखाने का मैदान मत बनाइए। तेज गति से वाहन चलाना कोई उपलब्धि नहीं है और न ही दूसरों को डराकर सड़क पर निकल जाना किसी प्रकार की वीरता है। याद रखिए, आप घर से निकलते समय केवल अपने लिए नहीं, बल्कि अपने माता-पिता, भाई-बहनों और पूरे परिवार के लिए भी जिम्मेदार होते हैं। आपके माता-पिता इस विश्वास के साथ आपको घर से बाहर भेजते हैं कि आप अपना काम पूरा करके सुरक्षित वापस लौटेंगे।
जरा एक पल ठहरकर सोचिए कि आपकी लापरवाही से यदि किसी राहगीर की जान चली जाए, किसी परिवार का कमाने वाला सदस्य अपंग हो जाए या किसी मां की गोद सूनी हो जाए, तो उस परिवार पर क्या बीतेगी?
किसी परिवार का एकमात्र कमाने वाला व्यक्ति दुर्घटना का शिकार हो जाए तो उसके बच्चों की पढ़ाई, माता-पिता का सहारा और पूरे परिवार का भरण-पोषण कैसे होगा? क्या आपके कुछ क्षणों के रोमांच की कीमत किसी दूसरे परिवार को जीवनभर चुकानी चाहिए?
माता-पिता और अभिभावकों की जिम्मेदारी भी कम नहीं
इस विषय पर माता-पिता और परिवार के बड़े-बुजुर्गों को भी आत्मचिंतन करने की आवश्यकता है। बच्चों को महंगे वाहन और उनकी इच्छानुसार सुविधाएं उपलब्ध कराना ही अभिभावक का दायित्व नहीं है, बल्कि उन्हें यह संस्कार और समझ देना भी उतना ही जरूरी है कि वाहन का उपयोग किस प्रकार किया जाना चाहिए।
अपने बच्चों की गतिविधियों पर ध्यान दीजिए। वे किस प्रकार वाहन चलाते हैं, कितनी गति से चलते हैं, उनके वाहन में किस प्रकार के साइलेंसर लगे हैं, वे किन मित्रों के साथ समय बिताते हैं और यातायात नियमों का पालन करते हैं या नहीं—इन बातों को भी गंभीरता से समझिए।
बच्चों की हर जिद पूरी करना प्रेम नहीं है। कभी-कभी समय रहते समझाना, रोकना और अनुशासन सिखाना ही उनके जीवन की सबसे बड़ी सुरक्षा बन जाता है।
प्रशासन और समाज भी अपनी जिम्मेदारी समझें
शहर के जिम्मेदार नागरिकों, पुलिस प्रशासन और यातायात विभाग से भी आग्रह है कि व्यस्त मार्गों, बाजारों और कॉलोनियों में तेज गति से वाहन चलाने वालों, स्टंट करने वालों तथा तेज आवाज वाले अवैध साइलेंसर का उपयोग करने वालों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई की जाए। विशेष रूप से त्योहारों के दिनों में यातायात व्यवस्था, जागरूकता अभियान और नियमित निगरानी को प्राथमिकता दी जाए।
साथ ही विद्यालयों, महाविद्यालयों, सामाजिक संगठनों और युवा मंचों के माध्यम से सड़क सुरक्षा को लेकर जागरूकता अभियान चलाए जाएं।
इस दीपावली एक संकल्प लें—हर घर का दीपक सुरक्षित रहे
हम किसी के घर में कितनी रोशनी कर पाएंगे, यह अलग विषय है, लेकिन हमारी वजह से किसी दूसरे के घर का दीपक बुझ जाए, इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है?
दीपावली का वास्तविक आनंद तभी है, जब हर परिवार सुरक्षित हो, हर मां अपने बच्चे की प्रतीक्षा में निश्चिंत हो, हर पिता अपने बेटे के घर लौटने का इंतजार विश्वास के साथ करे और हर घर में खुशियों के दीप जलते रहें।
युवाओं से मेरा विशेष आग्रह है कि वाहन धीरे चलाएं, हेलमेट और सीट बेल्ट का उपयोग करें, यातायात नियमों का पालन करें, नशे की स्थिति में वाहन न चलाएं और सड़क पर दूसरों की सुरक्षा का भी उतना ही ध्यान रखें जितना अपनी सुरक्षा का रखते हैं।
याद रखिए—
रफ्तार से मंजिल जल्दी मिल सकती है, लेकिन लापरवाही जिंदगी की मंजिल छीन सकती है।
आपका कुछ मिनट का संयम किसी परिवार की पूरी जिंदगी बचा सकता है।
आइए, इस दीपावली हम सभी संकल्प लें कि न स्वयं तेज गति और लापरवाही से वाहन चलाएंगे और न ही अपने परिवार के किसी सदस्य को ऐसा करने देंगे। क्योंकि युवा ही देश का भविष्य हैं और सुरक्षित युवा ही सशक्त समाज एवं विकसित भारत की नींव हैं।
मेरी यह अपील केवल मंदसौर शहर तक सीमित नहीं है, बल्कि मंदसौर जिले, मध्यप्रदेश और पूरे देश के प्रत्येक युवा, अभिभावक एवं जागरूक नागरिक से है।
खुशियां बांटिए, खतरे नहीं।
रोशनी फैलाइए, किसी के जीवन में अंधेरा नहीं।
सुरक्षित चलिए, सुरक्षित पहुंचिए और अपनों के बीच दीपावली मनाइए।
सभी से निवेदन के साथ अपील विनय दुबेला ने की सड़क सुरक्षा केवल यातायात का नियम नहीं, बल्कि मानव जीवन के प्रति हमारी नैतिक जिम्मेदारी है।