रायपुर। वेदों की शिक्षा हमें नैतिकता सिखाती थी। मैकाले शिक्षा पद्धति ने हमें नौकरी करना और ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना सिखाया। हमें कितना पैसा कमाना है, कब तक कमाना है, यह बताने वाला कोई नहीं है। धर्मसभा विद्वतसंघ श्रीश्री जगतगुरु शंकराचार्य पीठम के राष्ट्रीय अध्यक्ष ब्रह्मचारी निरंजनानंद आचार्य वेदमूर्ति धनंजय शास्त्री वैद्य ने इस आशय के विचार धर्म- आध्यात्म पर विशेष चर्चा सत्र के दौरान व्यक्त किए।
आचार्य धनंजय ने कहा कि अब तो हमें पैसा कमाने वाली पत्नी चाहिए। हम उसकी जिम्मेदारी लेने तैयार ही नहीं है। यही स्थिति लड़कियों को लेकर भी है। वो अपने बायोडाटा में खुलेआम ओकेजनली ड्रिंक करने की बात भी करती है। ऐसे में नैतिकता कहां है और संस्कार कहां। हमें अपनी प्राचीन शिक्षा पद्धति और गुरुकुल की ओर लौटना होगा। उन्होंने बताया कि हमारे वेद आकलन के आधार पर हैं, जो हमें आसन्न विपदा से न केवल बचाते हैं, बल्कि सावधान रहने और तैयारी करने का अवसर प्रदान करते हैं। दूसरी ओर विदेशों की शिक्षा अनुभव पर आधारित है। जबकि हमारी शिक्षा सिद्ध होती है।
आचार्य धनंजय शास्त्री ने कहा कि हमारे समाज से लेकर परिवार तक में संस्कारों के क्षरण और बढ़ती विकृति की एकमात्र वजह है हमारी धर्म से बढ़ती दूरी। आधुनिक जीवनशशैली में तमाम समस्याओं, तनावों और बिखरते रिश्ते की वजह संस्कारों की उपेक्षा है। उन्होंने कहा कि हमारी तुलना में जैनियों, मारवाडियों की जीवनशैली काफी अनुशासित और बेहतर है। इसके पीछे भी उनके परिवारों का संस्कारी होना ही है। वहां के बच्चे अपने अभिभावकों से धर्म, आध्यात्म, संस्कार से लेकर व्यापार के गुण तक सीखते हैं, जबकि अब तो हमारे यहां कई मामलों में बच्चे ही हमें सिखाने लगते हैं। आचार्य ने स्पष्ट कहा कि रिश्तों में मर्यादा होनी चाहिए। पिता अपने पुत्र का कभी भी दोस्त नहीं हो सकता। माता- पिता, सास- ससुर, भाई- भाभी, देवर- ननद से मेल- मुलाकात में इसी मर्यादा का पालन होना चाहिए।
आचार्य श्री ने कहा कि खानपान में भी हमारे वेद मार्गदर्शन देते हैं। पहले हम खाने में दही, मही का उपयोग करते थे, तो हमारी पाचन क्रिया अच्छी होती थी। अब दही उपयोग भी करते हैं, तो पैकेट वाला। जिसमें सीमित मात्रा में ही बैक्टिरिया होती है। उन्होंने कहा कि बारिश के पानी से और मिट्टी के बर्तन में जमने वाला दही सर्वोत्तम होता है और उसमें शरीर के लिए लाभदायक बैक्टिरिया सर्वाधिक होते हें।
